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खाद्य सुरक्षा पर दोरंगी चाल

  • 1 फरवरी 2015

यूपीए की सरकार में जब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम पर भारतीय संसद में बहस हो रही थी तो भाजपा के नेताओं ने इसे ज़्यादा मजबूत बनाने की पैरवी की थी. आम चुनावों के बाद जब ख़ुद भाजपा सरकार मे पूर्ण बहुमत में आ गई है तो पार्टी अपना स्टैंड बदलती प्रतीत हो रही है.

हाल ही में भाजपा नेता शांता कुमार के अध्यक्षता में बनी एक उच्च स्तरीय समिति ने खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत दिए जाने वाले अधिकारों में कटौती की सिफ़ारिश की है. समिति की सिफ़ारिशें इस अधिनियम को कमज़ोर करेंगी.

अपनी तमाम ख़ामियों के बावजूद बिहार जैसे राज्यों में इस अधिनियम को लागू करने से आम लोगों को काफ़ी लाभ मिला है.

पढ़ें लेख विस्तार से

पूर्व खाद्य-मंत्री शांता कुमार ने हाल ही में एक स्तब्ध कर देने वाला खुलासा किया कि पिछले साल खाद्य सुरक्षा अधिनियम पर भारतीय जनता पार्टी का समर्थन एक बहाना था.

याद रहे, जब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम पर संसद में बहस हो रही थी तो भाजपा के नेता सबसे आगे बढ़कर कह रहे थे कि यह कानून और ज्यादा मजबूत होना चाहिए. और अब बेलाग-लपेट के हमें बताया जा रहा है कि चुनावों के मद्देनजर यह एक दिखावा भर था अन्यथा भाजपा तो अधिनियम के विरोध में है.

शांताकुमार की अगुवाई में बनी एक उच्च स्तरीय समिति ने भारतीय खाद्य निगम के बारे में एक रिपोर्ट सौंपी है जिसमें खाद्य सुरक्षा अधिनियम में कटौती की सिफ़ारिश की गई है.

यह अधिनियम तीन तरह के अधिकारों की गारंटी देता है. इसके अंतर्गत बच्चों को पोषाहार देना, मातृत्व लाभ देना तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ज़रिए सस्ते दर पर खाद् पदार्थ देना शामिल है.

शांताकुमार समिति की रिपोर्ट की सिफ़ारिशों में बाक़ी बातों के अलावा कहा गया है-

(1) 67 प्रतिशत की जगह कुल 40 प्रतिशत आबादी को सस्ते दर पर खाद्य पदार्थ दिया जाय.

(2) योजना के तहत दिए जाने वाले चावल और गेहूं का मूल्य क्रमश: तीन रुपए और दो रुपए प्रति किलो से बढ़ाकर उनके न्यूनतम समर्थन मूल्य का आधा कर दिया जाय.

(3) जिन राज्यों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पूरी तरह कंप्यूटरीकृत नहीं किया गया है उन राज्यों में इसे इसके बाद लागू किया जाय.

अगर सरकार इन सिफ़ारिशों पर अमल करती है तो इससे गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के बढ़ने की आशंका है. कंप्यूटरीकरण से कामकाज़ में मदद मिलती है लेकिन ये भ्रष्टाचार रोकने का पुख्ता उपाय नहीं है. इससे बेहतर होगा कि आम लोगों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़े.

अधिकार के लिए संघर्ष

आम लोगों को अपने अधिकारों के बारे में पता होगा तो वे उसके लिए ख़ुद संघर्ष करेंगे. अगर योजना के तहत दिए जाने वाले अनाज की क़ीमत कम होगी तो लोग इसके लिए ज़्यादा संघर्ष करेंगे. क्योंकि कम क़ीमत की वजह से उन्हें ये अनाज अपनी ख़रीद क्षमता के भीतर जान पड़ेगा.

यदि खाद्य सुरक्षा के दायरे में आने वाले लोगों की संख्या बड़ी होगी तो सरकार पर पड़ने वाला सामूहिक दबाव भी कहीं ज़्यादा होगा.

खाद्य सुरक्षा का बड़ा दायरा, विक्रय मूल्य का कम होना और अधिकारों के बारे में स्पष्ट जानकारी जैसी बातें सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के मुख्य तत्व हैं और कई राज्यों में इन्हें कारगर तरीक़े से अपनाया गया है.

भ्रष्टाचार से जर्जर बिहार जैसे राज्य तक में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बुनियादी बदलाव के लिए इस नज़रिए को अपनाया जा रहा है. आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए बिहार सरकार ने बीते कुछ महीनों में खाद्य सुरक्षा अधिनियम को लागू करने के लिए ज़ोरदार प्रयास किए हैं.

बिहार में सुधार

बिहार में ‘सामाजिक, आर्थिक एवं जाति जनगणना’ में दर्ज आंकड़ों के आधार पर ‘अपवर्जी नियम’ लागू कर राशनकार्ड तैयार किए गए हैं. बिहार के तक़रीबन 75 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों का अब तक नया राशनकार्ड या अंत्योदय कार्ड बन चुका है.

पहली दफ़े लोग इस बात से आगाह हैं कि प्रति व्यक्ति प्रति माह पाँच किलो अनाज उन्हें सरकारी राशन की दुकान से मिलेगा. विपक्षी दल (भाजपा समेत!) अपना अधिकार पहचानने और मांगने के काम में लोगों की मदद कर रहे हैं. इन सारी बातों के कारण सरकारी व्यवस्था पर काम को पूरा कर दिखाने का भरपूर दबाव पड़ा है.

बिहार के चार ज़िलों में रैंडम पद्धति से चुने गए 1000 परिवारों पर केंद्रित एक सर्वेक्षण से पता चला है कि नया राशनकार्ड बनवा चुके ज़्यादातर लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली से अपना अधिकार हासिल हो रहा है. बहुत सी अनियमितताओं के बावजूद बिहार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली आज सुधार के उस मुकाम तक जा पहुंची है जिसके बारे में पाँच साल पहले सोच पाना तक मुश्किल था.

यदि शांताकुमार समिति की सिफ़ारिशें मान ली जाती हैं तो बिहार में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुधारने के इस सारे काम पर पानी फिर जाएगा और बिहार को फिर से उसी पुराने ढर्रे पर लौटना होगा जब बीपीएल (ग़रीबी रेखा से नीचे) परिवारों को लक्ष्य करके और लाभार्थियों का दायरा कम रखते हुए ऊंची क़ीमत पर सरकारी दुकान से राशन दिया जाता था.

आंकड़ों की अनदेखी

शांताकुमार समिति की रिपोर्ट से लगता नहीं कि उन्हें इस मुद्दे की ज़्यादा समझ है. इस रिपोर्ट में चोरबाज़ारी के अनुमानित आंकड़ों के आधार पर नेशनल सैंपल सर्वे में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में कटौती करने की सिफ़ारिश की गई है.

जबकि हाल के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण तथा अन्य स्रोतों से हासिल प्रमाणों के व्यापक अध्ययन से कुछ महत्वपूर्ण तथ्य उजागर होते हैं. इन तथ्यों की शांताकुमार समिति ने अनदेखी की है.

पहली बात यह कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए होने वाली चोरबाजारी की मात्रा हाल के सालों में कम हुई है. भारत मानव विकास सर्वेक्षण के एक अध्ययन में भी इस बात को रेखांकित किया गया है.

दूसरे, जिन राज्यों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुधारने के सतत और गंभीर प्रयास किए गए हैं उन राज्यों में चोरबाज़ारी के मामले बहुत ज़्यादा घटे हैं. बिहार इसका नवीनतम उदाहरण है.

तीसरी बात यह कि चोरबाज़ारी के ज़्यादातर मामले गरीबी रेखा से ऊपर वाली श्रेणी के लिए निर्धारित कोटे या फिर अस्थायी किस्म के कुछेक दूसरे कोटे से संबंधित है. साल 2011-12, में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत हुए कुल आवंटन का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं कोटों से संबंधित था.

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत चोरबाज़ारी की आशंका वाले ये कोटे समाप्त किए जाने वाले हैं और उनकी जगह सुयोग्य परिवारों के लिए पाँच किलो प्रति व्यक्ति प्रति माह वाला कहीं ज़्यादा पारदर्शी तरीक़ा अपनाया जाना है. चोरबाज़ारी को रोकने के लिए यह तरीक़ा कहीं ज़्यादा कारगर है.

सीमाएँ और भविष्य

ऊपर बताये गये उपायों से शांता कुमार समिति की कुछ सिफ़ारिशों के मूल्यों का उल्लंघन नहीं होता. इनका ये मतलब नहीं कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के मौजूदा स्वरुप में कोई ख़ामी नहीं है. असल बात यह है कि पीछे जाने से बेहतर है आगे बढ़ना.

अपनी ख़ामियों के बावजूद राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरुस्त करने और उसे ज़्यादा कारगर बनाने का मौक़ा देता है.

बेहतर होगा कि केंद्र सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम पर अपना पक्ष साफ़ करे. अगर सरकार इसके विरोध में है तो उसे साफ़ बताना चाहिए.

महिला, भारत

अगर सरकार इसके विरोध में नहीं है तो उसे सामाजिक, आर्थिक एवं जाति जनगणना के आंकड़ों को जल्द तेज़ी के साथ जारी करना चाहिए, जिसकी वजह से कई राज्यों में कई काम रुके हुए हैं.

अगले बजट में केंद्र सरकार को मातृत्व लाभ के मद में भी कुछ आवंटन करना चाहिए क्योंकि इस अधिनियम के तहत यह क़ानूनी अधिकार है. या कहीं ऐसा तो नहीं कि इस मुद्दे पर भी भाजपा ने समर्थन का महज दिखावा भर किया था?

(लेखक रांची विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में विजिटिंग प्रोफ़ेसर हैं.)

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