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भय में होली का त्यौहार

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सुनील कुमार

भारत में एक माह पहले से होली की तैयारी चलती हैं सभी खुशी खुशी होली का त्यौहार मनाते हैं होली के एक सप्ताह पहले ऑफिसों, कॉलेजों, स्कूलों में होली के चर्चे होने लगते हैं। सड़क पर बच्चे गुब्बारे मारते हैं लेकिन शाहाबाद डेरी बंगाली बस्ती के कबाड़ी वालों के लिये यह सप्ताह भय में बीत रहा है कि वह होली खेल पायेंगे या नहीं। रंजित रविदास को भय है कि कहीं इस बार की होली कहीं बंगाली बस्ती में रहने वालों के लिए कही खून की होली न बन जाये।

शाहबाद डेरी की दूसरी तरफ बंगाली बस्ती है। इस बस्ती में 99 प्रतिशत पश्चिम बंगाल से हैं और कूड़े का काम (घरों से कूड़े उठाना, रास्ते, इंडस्ट्रियल एरिया से कूड़े चुनना) करते हैं। सरकार ‘स्वच्छता अभियान’ का नारे देकर या कुछ फोटो-सोटो खिंचवा कर भूल गई उसको यह कूड़े वाले अपने रोजी-रोटी के लिये ही सही इस अभियान को फ्री में लागू कर रहे हैं। इनको कूड़े उठाने के लिये कोई पैसा नहीं मिलता (घरों से कूड़ा उठाने का जो पैसा मिलता है वह भी इनके जेब में नहीं जाता है)। सड़क पर, इंडस्ट्रियल एरिया और इधर-उधर जो कूड़ा बिखरा होता है उसके लिये इनको कोई मजदूरी नहीं मिलती अगर कुछ मिलता है तो ‘गंदे लोग’ की उपाधि। इन कूड़ा उठाने/बिनने वाले के साथ सभी जाति और धर्म के लोगों द्वारा भेद-भाव किया जाता है। यह अपने रिक्शों से या पीठ पर कूड़े को लाद कर घर ले जाते हुये दिख जाते हैं अगर यह थके हो और बस या कोई पब्लिक वाहन (खाली भी हो तो) से अपने कूड़े के साथ घर जाना चाहे तो उनको इन वाहनों में यात्रा नहीं करने दिया जाता है। कूड़े के ढेर में ही इनकी जिन्दगी का गुजारा होता है।

इस तरह कि जिन्दगी के बाद भी इन लोगों का किसी से कोई शिकायत नहीं है। वह अपने परिवार के साथ  अपनी जिन्दगी में खुश हैं लेकिन उनकी यह खुशी भी कुछ धनपिपाशुओं द्वारा छिनने की कोशिश की जा रही है। इनके बस्ती के आस-पास फैक्ट्री, गोदाम बने हैं तो कुछ ऐसे ही खाली चारदीवारी बना कर छोड़ दिये गये हैं। इनकी झुग्गी बस्ती को नरेन्द्र राणा ने 10 साल पहले बसाया था जब से वह इस जमीन पर रहते आ रहे हैं। इन्ही बस्ती में स्माईल शेख, मेहरूद्दीन, चुमकी, कबरू, रंजित रविदास, राजेन्द्र आदि की झुग्गियां हैं जिसके सामने फैक्ट्री हैं। फैक्ट्री मालिक कौन है, इस फैक्ट्री में क्या बनता है इन बस्ती वालों को नहीं पता लेकिन यह फैक्ट्री मालिक लगातार फैक्ट्री के सामने की जमीन पर अपना दावा करता आया है। बस्ती वालों द्वारा जमीन का कागज दिखाने के कहने पर कभी कागज दिखाया नहीं गया। बस्ती में 18 तारीख को सुबह 4 बजे आग लगा दिया गया। इसमें कई घर आग में स्वाहा हो गये।

समई जो कि अपने परिवार के साथ रहते हैं बताते हैं कि सुबह वह नित्यकर्म करने के लिये गये थे तभी बस्ती में आग लग गई। समई घर के परिवार तो बाहर सुरक्षित निकल गये लेकिन उनके घर का सभी समान आग में स्वाहा हो गया और इकट्ठा किया हुआ कबाड़ जल कर खाक हो गया। घर में किस्त पर लिये फ्रीज और टीवी भी जल कर स्वाहा हो गये।

चुमकी अपने बच्चे कुसुम, रेशमा, अशरफ के साथ रहती है। वह अपने बच्चों की पालन-पोषण के लिये रोहणी सेक्टर 13 के घरों में काम करती है और अपने बच्चों और अपने लिये दो जून की रोटी की व्यवस्था करती है। चुमकी का रो रो के गले बैठ गया हैं। उसके घर का कोई भी समान नहीं बचा है जो कपड़े उसके शरीर पर है वही बचा हुआ है। कुसुम और रेशमा चौथी कक्षा में पढ़ती है जिनकी परीक्षा चल रही है उनके किताब, कॉपी जल गये हैं वह परीक्षा देने नहीं गई। पास में बैठी रेशमा बताती है कि मैंने ‘‘मैडम को खबर भेजा था लेकिन उन्होंने कोई खबर नहीं दिया।’’ चुमकी को चिंता है कि कैसे वह अपने बच्चों के लिये फिर से कपड़े, किताब खरीद पायेगी। उसको बस एक ही सहारा दिखाई दे रहा है कि जिन घरों में काम करती है शायद वहां से कोई सहायता मिल जाये।

रहीमा के पिता मेहरूद्दीन और भाई कूड़े का काम करते हैं। पिता घर (बंगाल) गये हुये हैं वह 19 को ट्रेन में थे लेकिन आग के बारे में उनको जानकारी नही दी गई है। रहीमा बताती है कि एक साल का कबाड़ इक्ट्ठा करके रखा हुआ था ताकि इसको एक साथ बेचकर बहन की शादी करना था। एक साल से कबाड़े कि किमत कम हो गई है आशा था कि जब कबाड़े का थोड़ा दाम अच्छा होगा तो इसको बेचा जायेगा। घर के खर्च चलाने के लिये वह सुखी रोटी और कुछ थोड़े बहुत कबाड़ी बेच कर अपना काम चलाते थे लेकिन अब वह सारे कबाड़ जल कर खाक हो गये। रहीमा बताती है कि 8-10 बकरी और 8-10 मुर्गे भी जल गये हैं जो कि होली में बेचने वाले थे। घर में एक भी समान नहीं बचा है कि वह लोग खाना बना सकें। इतने नुकसान होने के कारण ही रहीमा ने आग की जानकारी पिता को नहीं दी कि पता नहीं वो इस नुकसान को बर्दास्त कर पायेंगे या नहीं।

राजेन्द्र और उनकी पत्नी फैक्ट्री में काम करते हैं वे लोग सुबह-सुबह जाकर सड़क से कबाड़ इक्ट्ठा करते थे। काम करने से जो पैसा मिलता था उससे परिवार चलता था और दो साल से कबाड़ इक्ट्ठा किये थे कि इसको एक साथ बेच कर कुछ काम कर सकते हैं लेकिन उनकी यह आशा उस आग में जलकर खाक हो गई।

रंजित रविदास 7-8 माह से इस बस्ती में रहने आये थे इसके पहले वह 20 साल से जहांगीरपुरी में रहते थे जहां उनको बेटा नशे का शिकार हो गया था। रंजित को आशा था कि यहां रहकर वह अपने बेटे को सुधार सकते है और अपने रिश्तेदार के कहने पर जहांगीरपुरी से शहाबाद बंगाली बस्ती में आ गये। उनके घर का सारा समान जल कर खाक हो गया।

इतने नुकसान सहने के बाद भी बस्ती वालों ने कोई शिकायत नहीं किया किसी से और उसे प्राकृतिक आपदा समझ भुला देने की कोशिश की और अपनी जले हुई झोपड़ी को ठीक करने लगे। उनके पास कोई नेता या किसी तरह की सरकारी सहायता नहीं पहुंची। बस्ती के लोगों ने ही मिल कर आग को बुझाया और आपस में चंदा इक्ट्ठा कर खाने की व्यवस्था कि और रिश्तेदारों, मुहल्ले वालों की मद्द से कुछ कपड़े पैसे इक्ट्ठे कर बल्ली, बांस लाये। जब वह जले हुये राख को हटा कर बल्ली, बांस से अपने लिये झोपड़ी तैयार कर रहे थे उस समय चार गाड़ी और बाईक पर कुछ गुंडे आये और मार-पीट शुरू कर दिया। शकीकुल शेख जो कि उसी बस्ती में रहते हैं अपने साली चुमकी को कपड़ा देने आये थे उन पर गुंडों ने बल्ली से हमला किया जिससे उनकी हाथ टूट गया। जिनको लेकर वे लोग खुद डॉ. अम्बेडकर अस्पातल रोेहणी में गये जहां प्लास्टर चढ़ा है और आगे डॉ ने कहा है कि इसमें राड डालना पड़ेगा।

शकीकुल के चार छोटे बच्चे हैं घर में वे और उनका एक बड़ा बेटा कमाता था। शकीकुल को अब अपनी अपने बच्चों के भविष्य की चिंता है कि वह इस टूटे हुये हाथ से कैसे काम कर पायेंगे उनके बच्चों का क्या होगा। शकीकुल रोते हुये पूछते हैं कि आपका हाथ तोड़ देगा तो आप बोझ उठा पाओगे?

जब वह गुंडे और लोगों पर हमला किया तो पूरे बस्ती के लोग इकट्ठा होकर गुंडों का प्रतिकार किया जिसके बाद वह फायरिंग करते हुये भाग खड़े हुये। यह सभी घटना दो पुलिस वाले की मौजूदगी में हुई। बाद में काफी संख्या में पुलिस वालों ने पहुंच कर इन बस्ती वालों को मारना-पीटना शुरू कर दिया। घरों से महिलाओं को खिंचा और थाने ले जाने कि कोशिश की। बबलू शेख जो अपने रिश्तेदार के लिये कपड़े लेकर आये थे उनको जबरदस्ती गाड़ी में बैठा लिया लेकिन बस्ती वालों की एकजुटता के सामने पुलिस को उन्हें छोड़ना पड़ा। जो दो पुलिस वाले वहां मौजूद थे वे उन महिलाओं और पुरुषों को खोज-खोज कर निशाना बनाना शुय किया जो उन गुंडों के प्रतिकार में आगे थे, महिलाओं को भद्दी गालियां दे रहे थे। हनिफा बिबि बताती है कि पुलिस वाले महिलाओं को ‘‘रन्डी की औलाद, …….में लात घुसा देंगे, फिल्म बनायेंगे’’ इस तरह की भद्दी भद्दी गालियां दे रहे थे। पुलिस डंडो और किल्ली (विकेट) से इन बस्ती वालों पर हमला कर रहे थे। बस्ती वालों ने बताया कि गुंडे गोली चला रहे थे तो वहां मौजुद पुलिस वालों ने कहा कि हमने तुमको पत्थर चलाते देखा है और कुछ नहीं देखा। जब पुलिस को 4 गोली के खोखे दिये गये तो बोला कि ‘‘क्या हुआ कोई मरा तो नहीं’’।

बाद में दस लोगों (5 महिला, 5 पुरुष) का मेडिकल कराया गया। गुंडे जाते हुये धमकी देकर गये कि हम तुमको यहां रहने नहीं देंगे। डर के कारण लोग घरों में नहीं सो रहे हैं। खुले मैदान में या एक छत हैं वहां उस पर बैठ कर रात को बस्ती वाले पहरा देते हैं।

इस कांड में अभी तक एक भी गिरफ्तारी नहीं हुई है और न ही इनको किसी तरह की मुआवजा मिला है। इनको झूठी आश्वासन देने के लिए भी कोई नेता और ना ही कोई प्रशासनिक अधिकारी इनके पास गया। आज भी बंगाली बस्ती के लोग डरे सहमे हुये घरों से बाहर सो रहे हैं उनको डर है कि कहीं ये होली उनके लिये कोई अनहोनी न कर दे। रंजित रविदास के शब्दों में होली खेलेंगे या खून की होली खेलेंगे। क्या इन बस्ती वालों को रहने का अधिकार नहीं है क्या इनके लिये भी कोई कानून संविधान, कोई भारत माता के रखवाले हैं? अपने गंदे में रहकर दुसरे को स्वच्छ रखने वालों पर हुये अत्याचार की सुनवाई की जायेगी? इनके जान-माल की सुरक्षा की गारंटी और इंसाफ मिल पायेगा?

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