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माओवाद से जंग, जंगल में अमंगल

  • 16 अक्तूबर 2014

वेट्टी हिड़मे अपने परिवार के साथ, बस्तर, छत्तीसगढ़,

मध्य प्रदेश से अलग हो कर बना छत्तीसगढ़ राज्य अस्तित्व में आने के दिन से ही माओवादी गतिविधियों के लिए सुर्ख़ियों में रहा है.

छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित इलाक़ों में गाँव वालों को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

माओवादियों और भारतीय सुरक्षा बलों के बीच होने वाले संघर्ष में अब तक हज़ारों ग्रामीण मारे जा चुके हैं.

मरने वालों से कहीं बड़ी संख्या उनकी है जिन्हें इस संघर्ष के कारण बेघर होना पड़ा है.

जुलाई के आख़िरी हफ़्ते में सुरक्षा बलों की कार्रवाई में दो लोग मारे गए, पुलिस उन्हें माओवादी बताती है लेकिन गाँव वाले इससे इनकार करते हैं.

पढ़े अजित साही की ख़ास रिपोर्ट

वेट्टी हड़मे, रामाराम गाँव, बस्तर, छत्तीसगढ़
32 वर्षीय वेट्टी हड़में कथित तौर पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारी गईं.

छत्तीसगढ़ में बस्तर के जंगलों के आदिवासियों को अपनी उम्र का अंदाज़ा कम ही होता है. वेट्टी हिड़मे की उम्र चालीस से पचास साल के बीच कुछ भी हो सकती है.

उनकी बड़ी बेटी की गोद में बच्चा है. दो बेटियाँ अविवाहित हैं.

28 जुलाई 2014 की सुबह हिड़मे को लगा वो ज़िंदा नहीं बचेंगी. “अंधाधुँध गोलियाँ चल रही थीं”, हिड़मे अपनी मातृभाषा गोंडी में अनुवादक के ज़रिए मुझे बताती हैं.

वो कहती हैं, “मेरी बेटियाँ, मैं और आसपड़ोस की कुछ महिलाएँ झोंपड़ी में दुबके हुए थे.”

उस दिन कुछ देर पहले ही हिड़मे झोपड़ी के बाहर झाड़ू लगा रही थीं. उनकी अविवाहित बीमार ननद झोपड़ी में लेटी थीं. हिड़मे के पति बाहर पैर धो रहे थे.

गाँव वाले चिल्लाने लगे कि फ़ोर्स आ रही है. वो कहते हैं, “मैं जंगल में दूसरी ओर भाग गया.” उनकी बड़ी बेटी, दूधी हिंगे, सौ ग़ज़ दूर ससुराल में थी जब “फ़ोर्स” की ख़बर आई. वो बच्चा लेकर माँ की झोपड़ी भाग आई.

अचानक ही हिड़मा की ननद, 32 वर्षीय वेट्टी हड़मे को गोली लगी और वो ढेर हो गईं. दो वर्दीधारी अंदर से हड़मे की लाश खींच ले जाने लगे. एक जलती हुई लकड़ी उठा कर हिंगे उनकी तरफ़ लपकीं. उन्हें लाश छोड़ कर जाना पड़ा.

बंटवारा

रामाराम गाँव, बस्तर, छत्तीसगढ़, ग्रामीण

ये घटना छत्तीसगढ़ राज्य के सुकमा ज़िले के रामाराम गाँव की है. साल 2000 में मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ बना तो नक्सलवाद सुर्ख़ी में आ गया.

नक्सलवाद से लड़ने के लिए पंद्रह सालों में बस्तर ज़िले को काट कर छह ज़िले बनाए गए हैं. सुकमा दक्षिण-पूर्व में तेलंगाना और ओडिशा से लगा है.

दक्षिण छत्तीसगढ़ में आज जगह-जगह बसे केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ़) के कैम्पों में कँटीले तारों, दूर तक रोशनी फेंकने वाली ऊँची बत्तियों, और मशीनगन-लैस सैनिकों का बंदोबस्त है.

नक्सलियों से लड़ने के लिए राज्य सरकार ने साल 2005 में आदिवासियों का सशस्त्र गुट भी बनाया.

गोंडी में “सलवा जुड़ुम” कहलाने वाले इस गुट के चलते सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर ज़िलों में हज़ारों आदिवासी मारे गए और बेघर हो गए.

पिछले पाँच वर्षों में नक्सलियों ने पुलिस और सीआरपीएफ़ को भारी नुक़सान पहुँचाया है. अप्रैल 2010 में सुकमा में एक नक्सली हमले में 85 जवान मारे गए थे. अप्रैल 2012 में नक्सलियों ने सुकमा के ज़िलाधीश का अपहरण कर 12 दिन बाद छोड़ा था.

मुहिम

वेट्टिमा हिड़मे, बस्तर, छत्तीसगढ़

मई 2013 में दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने हमला करके कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं समेत 28 लोगों की हत्या कर दी थी. पिछले साल अक्तूबर में सुकमा में नक्सलियों ने सीआरपीएफ़ के 11 जवान और चार पुलिसकर्मी मार दिए.

2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने सलवा जुड़ुम को ग़ैर-क़ानूनी क़रार दे दिया. सरकार कहती है सलवा जुड़ुम बंद होने से नक्सलविरोध को नुक़सान हुआ है और छत्तीसगढ़ में, जहाँ कोयला, कच्चा लोहा, चूना पत्थर, बॉक्साइट (जिससे एलुमिनियम बनता है) और कच्चा टीन का अपार अक्षत भंडार हैं, अरबों का औद्योगिक निवेश आगे नहीं बढ़ पा रहा है.

इस साल प्रधानमंत्री पद संभालते ही नरेंद्र मोदी ने नक्सलवाद ख़त्म करने की मुहिम दोबारा तेज़ करने की मंशा ज़ाहिर की थी. दो हफ़्ते बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने पुलिस अधिकारी शिवराम प्रसाद कल्लूरी को बस्तर संभाग का पुलिस महानिरीक्षक नियुक्त कर दिया.

कल्लूरी कहते हैं कि उनके महानिरीक्षक बनने के बाद से नक्सलियों के ख़िलाफ ख़ासी सफलता हासिल की है. “बस्तर में क्रांति हो रही है”, इस सप्ताह उन्होंने मुझसे फ़ोन पर कहा.

उन्होंने कहा, “हम ये लड़ाई जीत रहे हैं.” 28 जुलाई को रामाराम में मरने वालों को वो नक्सली बताते हैं. वो कहते हैं कि वहाँ दो नहीं 11 नक्सली मारे गए थे लेकिन नक्सली अपने नौ मृत साथियों की लाश ले गए.

दावे

आदिवासी महिला, बस्तर, छत्तीसगढ़, अजित साही

बस्तर के सामाजिक कार्यकर्ता और कई गाँव वाले भी कल्लूरी के दावों को ग़लत ठहरा रहे हैं. इनमें एक हैं पूर्व शिक्षिका सोनी सोरी, जिन्हें दो साल पहले पुलिस ने नक्सली बता कर महीनों जेल में रखा था और जिन्होंने पुलिस पर उप्तीड़न के आरोप लगाए हैं.

दंतेवाड़ा के पास अपने घर में एक मुलाक़ात में सोनी कहती हैं, “रामाराम गाँव में मारे गए दोनों लोग आम ग्रामीण थे.”

मैं रामाराम 20 अगस्त को पहुँचा था जिस रोज़ प्रथानुसार वेट्टी हड़मे का श्राद्ध था. क़रीब तीन सौ लोग जमा थे. कई दूर गाँवों से आए थे. मैंने गोलीबारी के चश्मदीद गवाहों से बातचीत की.

सबने इनकार किया कि 28 जुलाई को गाँव में नक्सली जमा थे या पुलिस की गोली से मरने वाले नक्सली थे. उन्होंने कहा कि मारी गई हड़मे नक्सली नहीं थी और सिर्फ़ डॉक्टर से मिलने गाँव से बाहर जाती थी.

मैंने कहा कि डॉक्टर की पर्ची साबित कर सकती है कि वो बीमार रहती थी. लेकिन प्रथा के मुताबिक़ गाँववालों ने हड़मे की लाश के साथ उसका सामान जला दिया था.

पोस्टमार्टम

बस्तर, चुनाव, छत्तीसगढ़, नक्सल

पोस्टमार्टम की सोचना तो दूर, गाँव वाले ऐसी घटनाओं की एफ़आईआर भी दर्ज़ कराने की कोशिश नहीं करते हैं. उनका आरोप है कि पुलिस उलटे उनके ही ख़िलाफ़ मुक़दमा बना देती है.

गाँव वालों के मुताबिक़ घटना के कुछ घटों बाद दर्जनों लड़के पंद्रह किलोमीटर दूर दोरनापाल नाम के गाँव के थाने गए जहाँ उस रोज़ रामाराम में मारे गए दूसरे व्यक्ति की लाश रखी थी.

काफ़ी जद्दोजहद के बाद उन्होंने लाश को क़ब्ज़े में कर लिया और वापस गाँव ले आए. गाँव वाले कहते हैं कि वो लड़का भी नक्सली नहीं था बल्कि पड़ोसी गाँव से आया हुआ अतिथि था.

सुरक्षाबलों और नक्सलियों, दोनों के आक्रामक रुख़ के चलते पिछले दो-तीन सालों में खोजी पत्रकारों या मानवाधिकार संगठन के कार्यकर्ताओं के लिए जंगल के भीतर जा पाना और मुश्किल हो गया है.

यही वजह है कि कि किसी भी वर्णन की स्वतंत्र पुष्टि करना लगभग नामुमकिन हो चुका है.

अब जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने नक्सलवाद से लड़ाई तेज़ करने का फ़ैसला कर लिया है, आने वाले वक़्त में दोतरफ़ा हिंसा बढ़ने का ख़तरा है.

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