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मूल्य विहीन राजनीति अपने पापों को धोने के लिए भगत सिंह की शरण ले रही है

मूल्य विहीन राजनीति अपने पापों को धोने के लिए भगत सिंह की शरण ले रही है

मूल्य विहीन राजनीति अपने पापों को धोने के लिए भगत सिंह की शरण ले रही है

Posted by: Amalendu Upadhyaya March 24, 2014 in खोज खबर 

मोदी ने भगत सिंह को अंडमान भेजकर यह साबित कर दिया है कि उनका और भाजपा का भगत सिंह के बारे में ज्ञान शून्य मात्र है।

भारतीय प्रवासियों ने कनाडा में मनाया भगत सिंह का 83 वां शहादत दिवस

टोरंटो से शमशाद इलाही शम्स

टोरंटो(कनाडा)। ब्रेम्पटन (कनाडा) स्थित पियर्सन थिएटर में प्रवासी भारतीयों ने अपने वतन से सात समुन्दर पार भारत की जंगे आज़ादी के महानायकों भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की 83 वीं शहादत बहुत संजीदगी और अकीदत के साथ मनाई।

इस कार्यक्रम का आयोजन इंडो कनेडियन वर्कस एसोसियेशन ने किया था। उपस्थित जनसमुह को पंजाबी साहित्य के जाने माने लेखक, पंजाब साहित्य आकादमी पुरूस्कार विजेता डाक्टर वारियाम सिंह संघु ने भगत सिंह की शहादत, उसके विचार और निजी ज़िंदगी के बारे में तफ्सील से बाते की। वारियाम सिंह संघु ने कहा कि हमें आज पत्थर का भगत सिंह नहीं चाहिए; हमें आज पगड़ी धारी या टोप धारी भगत सिंह नहीं चाहिए, भारत के नौजवानों को भगत सिंह का दिमाग चाहिए, उसके विचार चाहिए, उसका समर्पण चाहिए, उसके जैसी प्रतिबद्धताएं चाहिए जिसकी गैर मौजूदगी में वर्तमान भारत को भगत सिंह के सपनों वाला भारत बनाया जाना नामुमकिन है। उन्होंने कहा कि आज़ादी के बाद भारत के शासक दल लगातार भगत सिंह के बुत बनाने तस्वीरे लगाने में व्यस्त है लेकिन भगत सिंह के नक़्शे कदम पर चलने वालो को पुलिस की लाठियां, गोलियां और जेलें मिल रही है। इन दलों ने भारत की संसद में भगत सिंह का बुत भी लगाया है जिसके एक तिहाई सदस्य आपराधिक मामलों में मुलव्विस है। इसी संसद में भगत सिंह ने अपनी आवाज़ सत्ता तक पहुँचाने के लिए बम फेंके थे।

वारियाम सिंह संघु ने कहा कि आज भारत के हर शासक दल में भगत सिंह पर कब्ज़ा करने होड़ लगी है। आज किसी राजनैतिक दल के पास न कोई चरित्र है न नीति। मूल्य विहीन राजनीति अपने पापों को धोने के लिए भगत सिंह की शरण ले रही है। उन्होंने भाजपा नेता और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की खिल्ली उड़ाते हुए कहा कि मोदी ने भगत सिंह को अंडमान भेजकर यह साबित कर दिया है कि उनका और भाजपा का भगत सिंह के बारे में ज्ञान शून्य मात्र है। उन्होंने कहा कि जिस तरह 2002 में गुजरात में मुसलमानों का नरसंहार हुआ, 1984 में सिखों को दिल्ली में जिस तरह जिंदा जलाया गया, जिस तरह पंजाब में दहशतगर्दी के दौरान बसों से उतार-उतार कर हिन्दुओं की हत्याएं की गयी, जिस तरह पूरे देश में सरकार आम जनता के प्रति अधिकाधिक हिंसक हो रही है, निश्चय ही यह वह भारत नहीं है जिसकी स्वतंत्रता के लिए भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। उन्होंने अकाली दल नेता प्रकाश सिंह बादल के दोहरे चरित्र पर चोट करते हुए कहा कि बादल एक तरफ भगत सिंह के नाम पर जलसे जलूस करते नहीं थकते लेकिन दूसरी तरफ प्रदर्शनकारी किसानों पर लाठी चार्ज करा कर उनकी पगड़ियाँ पुलिस के पैरों तले रौंदते हैं। कौन नहीं जानता कि भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह ने 20वीं सदी के आरंभ में किसान आन्दोलन खड़ा कर ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ जैसे स्वाभिमानी नारे से उन्हें लैस किया था। आज किसानों की पगड़ियाँ अकाली सरकार द्वारा पैरों से रौंदी जा रही है।

वारियाम सिंह संघु ने अपने भाषण के अंत में जनता का आह्वान किया कि मौजूदा शोषण और काले अंग्रेजों के चुंगल से भारत को आज़ाद कराने के लिए जनता को भी अपने दोहरेपन से निजात लेनी होगी। भगत सिंह के पैदा होने की कमाना पडौस में नहीं अब उन्हें अपने घरो में भगत सिंह को पैदा करना होगा तभी भारत में एक समता मूलक, न्यायपरक, जाति विहीन गैर फिर्केवाराना समाज पैदा होगा तभी समाजवादी क्रांति होगी।

उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए भगत सिंह के भाई मरहूम कुलतार सिंह की बेटी इन्द्रजीत कौर के शौहरकामरेड अमृत सिंह ढिल्लों ने भगत सिंह की निजी बातों को विस्तार से बताया जिसे हाल में बैठे समस्त लोगों ने बड़ी उत्सुकता से सुना। 5 फुट 10 इंच के भगत सिंह मिठाई के शौक़ीन थे और मिठाई में रसगुल्ला उन्हें सबसे अधिक पसंद था। फलों में उन्हें संतरा प्रिय था। सांडर्स की हत्या के बाद भूमिगत जीवन के दौरान हुई एक घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि भगत सिंह राजगुरु और चंद्रशेखर आगरा में मंडी के पीछे किसी गुमनाम जगह रह रहे थे। राजगुरु ने उस कमरे की दीवार पर एक बिकनी पहने किसी लड़की का चित्र लगाया था। चंद्रशेखर ने उस तस्वीर का फाड़ दिया, वह गुस्से वाले थे और राजगुरु द्वारा वजह पूछे जाने पर जवाब दिया, हम क्रांतिकारी है हमें ऐसी तस्वीरो से कोई लगाव नहीं होना चाहिए। राजगुरु ने बहस करते हुए कहा कि हम संपन्न, सुखी समाज की कल्पना करते हैं। इस बहस के दौरान भगत सिंह चुप रहे लेकिन एक संपन्न समाज कैसा होगा? यह सवाल उन्हें सालता रहा और इस विषय पर अध्ययन करने जुट गए। फिरोजशाह कोटला मैदान में जब संगठन बनाने की निर्णायक बैठक हुई तबहिन्दुस्तान रिपब्लिक ऐसोसियशन में सोशलिस्ट लफ्ज़ भगत सिंह के कहने पर ही जोड़ा गया था। इस तरह सुखी और संपन्न समाज की परिकल्पना आगरा के उस गुमनाम कमरे में राजगुरु और चंद्रशेखर के बीच हुई बहस का सूत्रीकरण भगत सिंह ने समाजवाद के रूप में किया।

अमृत ढिल्लो ने भगत सिंह के सिर्फ चार असली फोटो के बारे में भी तफ्सील से बताया और उनसे जुडी घटनाओं को भी बहुत निराले अंदाज़ में ब्यान किया।

लाहौर में जन्मे ‘कमेटी आफ़ प्रोग्रेसिव पाकिस्तानी कनैडियन’ की तरफ से आये फहीम खान ने जलसे को खिताब करते हुए कहा कि मानव जाति ने तीन बड़े शहीद पैदा किये। हजरत अली, गुरु तेग बहादुर और भगत सिंह। पहले दो शहीद अपने-अपने मज़हबी अकीदो के लिए शहीद हुए जबकि भगत सिंह का कद इस लिए बड़ा है कि वह किसी धार्मिक समुदाय का प्रतिनिधित्व करे बिना पूरी कौम और दुनिया भर के मजदूर, किसानों, साम्राज्यवाद का ज़ुल्म सहने वालों के हको के लिए शहीद हुए। इस लिए मानव इतिहास में उनका मुकाम सबसे अव्वल है। उन्होंने बताया कि कि लाहौर में एक चौराहे का नाम भगत सिंह चौक रखने पर मुल्लाहों ने सख्त सियासी ऐताराज़ किया और मामला कोर्ट में भी ले गए। उन्होंने यकीन दिलाया कि पकिस्तान के हुक्मरानों को यह बात जल्द समझ में आ जायेगी कि भगत सिंह का हक़ पाकिस्तान पर भी है उतना ही है जितना हिंदुस्तान पर है।

सभागार में उपस्थित भगत सिंह की बहन बीबी प्रकाश कौर (जो बहुत वृद्ध है और कनाडा में ही रहती हैं) के बेटे रूपेंद्र सिंह मल्ली उनकी पत्नी कर्मजीत सिंह मल्ली, अमृत सिंह ढिल्लों, इन्द्रजीत कौर ने खड़े होकर जनता का अभिवादन स्वीकार किया।

कार्यक्रम में कवियत्री सुरजीत कौर, सुखचरण प्रीत और परमजीत कौर ने अपने कलाम सुनाये। बुजुर्ग कवि लक्ष्मण सिंह गाखिल ने भगत सिंह पर लिखा कलाम सुनाया और युवा कवि जीतेन्द्र पाल मान ने बहुत जोशीली कविता सुनायी। मक्खन बरार साहब ने अपनी नुकीली धारदार कविता से जलसे में नया रंग भरा वही सुखदेव- नवतेज भाईयों ने संगीत के साथ अपना कलाम पेश कर माहौल को सुर मय बनाया।

तीन घंटे से अधिक चले इस कार्यक्रम में प्रमुख आकर्षण भारत के प्रसिद्द नकाटकार गुरशरण सिंह द्वारा लिखा नाटक, ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ का मंचन किया गया जिसे शहनाज़ ने निर्देशित किया था और व्यवस्था कुलदीप रंधावा ने की थी। नाटक की प्रस्तुति इतनी सशक्त थी कि हाल में अनूठा पिन ड्राप साएलेंस रहा, ऐसा मंज़र किसी पब्लिक कार्यक्रम में शायद ही देखने को मिलता है।

हरेन्द्र हुंदल ने इंडो कनेडियन वर्कर्स एसोसिएशन के क्रिया कलापों की जानकारी देते हुए निजी कम्पनियों के बजाये पब्लिक कार इन्सुरेंस सेवा मुहैय्या कराने, मिनिमम वेज १४ डालर प्रति घंटा करने, ऐम्प्लोयेमेंट एजेंसीज पर तत्काल प्रतिबन्ध लगाने के अपने एजेंडे को प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का बेहद सफल और बड़े रोचक अंदाज़ में संचालन प्रोफ़ेसर जागीर सिंह कहलो ने किया। आई सी डब्लू ए के सदर सुरिन्दर सिधु ने सभी आगंतुको, सहयोगियों का धन्यवाद दिया। संगठन सचिव सुरजीत सहोटा ने समस्त नाट्य कर्मियों को भगत सिंह की तस्वीर छपी टी शर्ट्स भेंट की।ध्यातव्य है यह संगठन पिछले दो दशको ने कनाडा में शहीद दिवस का लागातार आयोजन कर रहा है। इस संगठन की बुनियाद कामरेड सूच के कर कमलो द्वारा हुई थी जो इस वक्त बेहद बीमार चल रहे है।

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