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Tharu tribes in Dudhwa ,U.P submit their Claim of Community Resources #indigenous #tribalrights

 Below is a detailed report of thousands of Adivasi files community forest resource claims in Dudhwa National Park, District Lakhimpur Khiri, Uttar PradeshAround 2220 claims of resource rights were filed with the affair department project officer on 31st July. above 80% of women participated in filing the claims in their traditional dresses.
They went to submit the claims in form of a festival, singing and dancing. Photos are attached. The report in pdf file with phographs is also attached. 
Of the 46 villages in and around Dudhwa national park 17 villages prepared files according to the new amended rules of September 2012 and submitted here in chandan chowki, Dudhwa national Park.
                                                                                                                 
                                                                                                                                                AIUFWP
 रिपोर्ट

‘‘अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वन निवासी(वनाधिकारों की मान्यता) कानून-2006-नियमावली संशोधन-2012’’

के तहत

सामुदायिक वनसंसाधन दावा प्रस्तुतीकरण उत्सव 

दुधवा नेशनल पार्क व टाईगर रिज़र्व क्षेत्र

पलियाकलां-लखीमपुर खीरी-उत्तर प्रदेश

 

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दिनांक 31 जुलाई 2013 को उ0प्र0 के जनपद खीरी-पलियाकलां स्थित दुधवा नेशनल पार्क व टाईगर रिज़र्व क्षेत्र में बसे थारू जनजाति के 17 गाॅवों के 2220 परिवारों की करीब 2000 महिलाओं ने वनाधिकार कानून नियमावली संशोधन-2012 में दिया गया वन संसाधनों के अधिकार का अपना सामूहिक दावा अनूठे अन्दाज़ में अपने अधिकारों का एक उत्सव मनाते हुए अपने पारम्परिक नाच होरी को गाते हुए पहुंच कर अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर करीब 2000 महिलाओं सहित करीब 2500 लोगों ने इकट्ठा होकर क्षेत्र के गाॅव गोबरौला से ‘‘थारू आदिवासी महिला मज़दूर किसान मंच‘‘ व ‘अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन’’ के बैनर तले वनसंसाधन अधिकार जागरूकता यात्रा निकाली जिसकी अगुआई संगठन की नेतृत्वकारी थारू महिलाओं निबादा राणा, फूलमति राणा, रूकमा राणा, हरदुल्ली राणा, बिब्बी देवी सहित सैकड़ों महिलाओं ने अपनी पारम्परिक पौशाक पहन कर अपने पारम्परिक नृत्य होरी को नाचते व गाते हुए की। करीब ढाई हजार थारू महिला पुरूषों के इस अनुशासित कतारबद्ध जुलूस का दूसरा छोर एक छोर से दिखाई नहीं पड़ रहा था। दुधवा के जंगल की हरियाली के बीच महिलाओं के रंग-बिरंगे कपड़ों का दूर तक रंग बिखरा दिखाई दे रहा था। करीब 2000 की संख्या में यह जूलूस गोबरौला गाॅव से शुरू हुआ था और इस जूलूस में रास्ते में पड़ने वाले और बाद में पीछे से आने वाले तमाम गांवों के महिला पुरूष इसमें जुड़ते चले गए। यह बढ़ता हुआ कारवां इतना लम्बा हो गया कि इस कारवां का दूसरा छोर एक छोर से दिखाई नहीं पड़ रहा था। महिलाएं अपने पारम्परिक अधिकार आंदोलन का गीत ‘‘हम राणा थारू मांगें अपना अधिकार, कहां के रे हम राणा थारू का है हमारी जात’’ व ‘‘लहर-लहर लहराए रे झण्डा अपने यूनियन का‘‘ गाते नाचते हुए करीब 3 कि0मी0 का सफर तय करके चन्दन चैकी स्थित कानून की नोडल ऐजेंसी ऐकीकृत जनजातीय परियोजना कार्यालय पर पहुंचे। यहां भी उन्होंने परियोजना कार्यालय प्रांगण में करीब एक घंटा तक होरी नाच किया।

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तत्पश्चात परियोजना अधिकारी के समक्ष सूरमा, गोबरौला, भट्ठा, किशन नगर, सिकलपुरवा, बन्दरभरारी, जयनगर, देवराही, निझौटा, छिदिया पश्चिम, बिरियाखेड़ा, ढखिया, सूड़ा, भूड़ा, सरियापारा, कजरिया और बरबटा 17 गाॅवों के 2220 परिवारों के सामुदायिक वनसंसाधन के दावों की ग्रामवार अलग-अलग फाईलें प्रस्तुत कीं। अधिकारियों ने ग्राम सेवकों के माध्यम से भी लोगों के सामूहिक अधिकार के दावे भरवाए थे, जो कि अवलोकन करने पर गलत पाए गए और संगठन द्वारा तैयार किए गए दावा प्रपत्र ही सही साबित हुए। संगठन द्वारा तैयार कराई गई फाईलों को देखते हुए उन्हें कहना पड़ा कि इन फाईलों को बिल्कुल नहीं छेड़ा जाएगा, जांच करके दोहरे दावों को ग्राम सेवकों द्वारा भरवाई गई फाईलों से हटा दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि ये दावे प्रस्तुत करके हमारा काम यहीं खत्म नहीं हो जाता जिन लोगों के दावे अभी नहीं आए हैं वे भी जल्दी से अपने दावे भरवाकर प्रस्तुत करें, जिससे वनसंसाधनों का अधिकार पत्र सारी प्रक्रियाऐं पूरी करके उनको जल्द से जल्द सौंपा जा सके।Inline image 3Inline image 1

नियमावली संशोधन 2012 के तहत किए गए सामुदायिक वनसंसाधन के अधिकार के इस दावे के तहत यहां के लोगों को किसी भी तरह के जंगल में वनसंसाधनों को इकट्ठा करने के लिए पहुंच का अधिकार, अपने परिवहन साधनों को लेजाने का अधिकार, जंगल से प्राप्त होने वाली तमाम लघुवनोपज जैसे तमाम जंगली फल, फूल, जड़ी बूटी, पत्ता, जड़, ठूंठ, बेंत, बांस, फूस, जलौनी लकड़ी, रोहिणी, धरती के फूल, कटरूआ, आॅवला, बेल, शहद, मोम, मछली मारन, थूना, थम्मर, बल्ली आदि को अपने इस्तेमाल व अपनी सहकारी समितियों का गठन करके आजीविका के लिए बाज़ार में बेचने के अधिकार को अधिकार पत्र देकर मान्यता दी जानी है और अब ग्राम वनाधिकार समितियों द्वारा जारी किए जाने वाली परमिट प्रणाली लागू होगी, वनविभाग द्वारा तैयार किए जाने वाले वर्किंग प्लान में भी ग्राम समितियों को हस्तक्षेप करने का अधिकार इन अधिकारों में शामिल होगा।

वनसंसाधनों के सामुदायिक दावों को इस तरह से भरकर और प्रस्तुत करने के लिए अपने पारम्परिक अनूठे अंदाज़ में अधिकारियों के समक्ष जाकर यहां की थारू महिलाओं-पुरूषों ने निश्चित तौर पर एक मिसाल क़ायम करने का काम किया और वे जिस उत्साह से आए थे, उससे दोगुणा उत्साह और उमंग के साथ अपने संगठन के प्रति पूरी निष्ठा ज़ाहिर करते हुए अपने-अपने घरों को वापिस लौटे। इससे पूरे क्षेत्र में एक सकारात्मक असर फैल रहा है और अपने सामूहिक वनसंसाधन का दावा करने से छुटे हुए परिवार व गाॅव संगठन के कार्यकर्ताओं से वहीं आकर मिलने लगे और जल्दी से जल्दी अपने दावे भरवाने की बात करने लगे। ये बात स्पष्ट रूप से सामने आ रही है कि अब दुधवा क्षेत्र में वनविभाग और यहां के वनक्षेत्र में निहित स्वार्थों के तहत मुनाफा कमाने वाली ताकतों का वर्चस्व समाप्त होना और उनका जाना तय है।

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 दुधवा नेशनल पार्क में वनसंसाधन अधिकार के लिए थारू आदिवासी महिलाओं के संघर्ष के बारे में

उ0प्र0 के जनपद खीरी पलिया कलां नेपाल बार्डर पर स्थित दुधवा नेशनल पार्क व टाईगर रिज़र्व क्षेत्र में बसे थारू जनजाति बहुल 46 गाॅवों की महिलाओं के नेतृत्व में पिछले 10 सालों से वनाधिकारों की मांग को लेकर लगातार तेज़ी पकड़ता हुआ संघर्ष नेशनल पार्क के कोर जोन बसे सूरमा गाॅव और बफर जोन में बसे गाॅव गोलबोझी की जीत और वनविभाग द्वारा की जा रही प्रतिवर्ष 5 करोड़ रुपये की वसूली पर रोक के बाद एक और नई व ऐतिहासिक जीत की तरफ कदम बढ़ा रहा है। यहां के स्थानीय प्रशासन व पुलिस को अब दुधवा के थारू आदिवासियों की वनसंसाधनों पर हक़ की मांग अब जायज़ दिखने लगी है और वे वनाधिकार कानून में 2012 में किए गए संशोधनों में दिये गए तीसरे दावा प्रपत्र को भरकर जल्द से जल्द जमा कराने की बात कहने को मजबूर हुए हैं।

विदित हो कि सन् 1978 जब इस वनक्षेत्र को दुधवा नेशनल पार्क के रूप में अधिसूचित किया गया, तब इसके कोर जोन में आने वाले गाॅव सूरमा और बफर जोन में आने वाले गाॅव गोलबोझी को विस्थापन के आदेश दे दिए गए। सूरमा गाॅव के लोगों ने 1980 में उच्चन्यायालय में याचिका दायर की लेकिन 23 वर्ष बाद सन् 2003 में उच्च न्यायालय ने भी इस गाॅव के विस्थापन की ही मुहर लगाई। इसके ऊपर 2003 में ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पार्क-सेंचुरी क्षेत्रों से लोगों को विस्थापित करने सम्बंधी एक आदेश ने वनविभाग और तथाकथित वन्यजन्तु प्रेमियों की लाबी को और ताकत देने का काम किया और सूरमा जैसे गाॅवों पर ज़ुल्म-ओ-ज़्यादती का पहाड़ टूट पड़ा। लेकिन लोगों ने संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ और वे अपनी जगहों पर लड़ते हुए डटे रहे। सूरमा गाॅव के विस्थापन के खिलाफ यहां दुधवा क्षेत्र के 46 गाॅवों में आंदोलन तभी से बढ़ने लगा और विस्थापन के मुद्दे पर छयालिसों गाॅवों के थारू आदिवासी एकजुट होने लगे। दिसम्बर-2006 में वनाधिकार कानून के आने के बाद यहां के संघर्ष ने एक नया रूप ले लिया और वे कानून के तहत अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने लगे। परिणाम स्वरूप संगठन द्वारा तत्कालीन राज्य सरकार से कानून के क्रियान्वयन के विषय पर कई वार्ताएं की व सूरमा, गोलबोझी व एक अन्य गाॅव देवीपुर के मामले को राजनैतिक पटल पर लाने में सफलता हासिल की। ज़मीनी व राजनैतिक प्रयासों के फलस्वरूप अंततः 8 अप्रेल 2011 को सूरमा, गोलबोझी व देवीपुर 3 गाॅवों को व्यक्तिगत अधिकारों के अधिकार पत्र देकर मान्यता दे दी गई। इसका विजय दिवस उत्सव यहां के लोगों ने 1 मई 2011 को ऐतिहासिक मज़दूर संघर्षों की जीत के प्रतीक मजदूर दिवस के रूप में मनाया, जिसमें हजारों लोग देशभर से शामिल हुए।

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इसके अलावा दुधवा क्षेत्र में बसे 46 गांवों के थारू आदिवासी परिवारों से वन विभाग ऐतिहासिक रूप से मात्र जलौनी लकड़ी और फूस के संग्रहण के नाम पर प्रत्येक परिवार से एक कुन्तल धान, 50 किलो गेंहू, 25 किलो सरसो और नगद रू0 गल्ला वसूली प्रतिवर्ष लिया करता था। जिसकी अनुमानित राशि 46 गांवों के कुल करीब 10000 परिवारों से कम से कम 5 करोड़ रूपये बैठती है। जंगल जाने पर शिकार व पेड़ काटने की धाराऐं लगाकर लोगों पर 10 से 50 हजार रू0 तक जुर्माना, पिटाई व जेल भिजवाना तथा महिलाओं के साथ जो बदसलूकी की जाती सो वो अलग।

1 जनवरी 2008 को वनाधिकार कानून लागू होने के बाद यहां पार्क प्रशासन व वनविभाग द्वारा कानून के क्रियान्वयन को रोकने व लोगों पर यह दबाव बनाने के लिए कि वे अपने दावे प्रस्तुत ना कर सकें इसलिए गल्ला वसूली करने के बावज़ूद घरों को बनाने के लिए फूस लेने पर रोक लगा दी, यही वो साल था जब इस पूरे क्षेत्र को यहां से निकलने वाली तीन विशाल नदियों शारदा, सुहेली व मुहाना ने विकराल रूप धारण किया और पूरे क्षेत्र को बाढ़ ने अपनी चपेट में ले लिया। ऊपर से वनविभाग द्वारा फूस पर लगाई गई रोक से यहां के करीब 500 परिवार बेघर या बेछत होकर सड़क पर आ गए। 2009 में वनविभाग द्वारा लगाई गई रोक के कारण यहां अपने अधिकारों को वनाधिकार कानून के तहत हासिल करने के लिए आंदोलन भी तेज़ हो गया और वनविभाग की इस मनमानी के खिलाफ एक बड़े आन्दोलन के रूप में लोग सड़कों पर उतर आए व वनविभाग द्वारा की जाने वाली अवैध गल्ला वसूली पर रोक लगानी शुरू कर दी। इस बढ़ते हुए आंदोलन के दबाव में जिलाधिकारी द्वारा पार्क प्रशासन के लिए आदेश जारी किए गए, लेकिन पार्क प्रशासन ने इन आदेशों को मानने से भी इन्कार कर दिया। महिलाओं की अगुआई में पूरे दुधवाक्षेत्र में वनविभाग द्वारा की जा रही अवैध वसूली पर रोक लगानी शुरू की गई व उन्होंने समूह में जंगल जाकर फूस व जलौनी लकड़ी लाने की शुरूआत की। जनवरी सन् 2010 में फिर रोक लगाई गई। तब यहां राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच के स्थानीय घटक संगठन थारू आदिवासी महिला मज़दूर किसान मंच के बैनर तले यहां के 46 गाॅवों की 16 ग्राम पंचायतों में गठित ग्राम स्तरीय वनाधिकार समितियों की ओर से 13 जनवरी 2010 को पार्क प्रशासन के नाम वनाधिकार कानून की धारा 7 के तहत नोटिस जारी किया गया, जिसे लोगों ने हजारों की संख्या में जुलूस निकाल कर नारे बाज़ी करते हुए दुधवा पार्क उपनिदेशक को थमाया। इस नोटिस की प्रति को प्रधानमंत्री भारत सरकार, केन्द्रीय जनजातीय मंत्रालय, केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, मुख्यमंत्री उ0प्र0, मुख्य सचिव उ0प्र0, प्रमुख सचिव एवं पर्यावरण विभाग, प्रमुख सचिव गृह विभाग सहित जिलाधिकारी खीरी, पुलिस अधीक्षक खीरी, उपजिलाधिकारी पलिया व पुलिस क्षेत्राधिकारी पलिया सहित तमाम स्थानीय, राज्य स्तरीय व राष्ट्रीय मीडिया को प्रेषित किया गया। नोटिस में पार्क प्रशासन को चेतावनी दी गई कि अगर 1 सप्ताह के अंन्दर अगर लोगों पर जंगल जाने व वनाधिकार कानून के तहत दिए गए अधिकार लघुवनोपज के अधिकार के तहत जलौनी व फूस लाने पर लगाई गई रोक को समाप्त नहीं किया गया तो 20 जनवरी 2010 को दुधवा नेशनल पार्क के अन्दर आने वाले 46 गाॅवों के लोग इकट्ठा होकर बनकटी, सोनारीपुर व दुधवा तीनों रेंज के जंगल में जाएंगे, अगर वनविभाग द्वारा रोक लगाने की कोशिश की गई तो होने वाले संघर्ष में किसी भी तरह की अप्रिय घटना घटने पर वनविभाग व पार्क प्रशासन के खिलाफ वनाधिकार कानून की धारा 7 के तहत कार्रवाई की जाएगी और इसके लिए पूरी तरह से जिम्मेदार पुलिस व प्रशासन होंगे। स्थानीय व लखनऊ मीडिया ने इस खबर को प्रमुखता से लिया व राज्य सरकार में भी इस नोटिस को लेकर हलचल मची। स्थानीय पुलिस क्षेत्राधिकारी व उपजिलाधिकारी 19 जनवरी की रात करीब 11 बजे तक सूरमा गाॅव में बैठ कर संगठन के अग्रणी साथियों की मिन्नतें खुशामदें करने को मजबूर हुए और वहीं संगठन के साथी रामचन्द्र राणा के घर फोन करके जिलाधिकारी खीरी ने भी अनुनय-विनय की और एक सप्ताह की मोहलत मांगने लगे। लेकिन संगठन के साथी अपनी बात पर अडिग रहे, उनका तर्क था कि इस बीच अगर वनविभाग ने जंगल की फूस में आग लगा दी तो हमारे तो एक तरह से घर जल जाएंगे। इस पर जिलाधिकारी केवल 2 दिन का समय लेते हुए 22 जनवरी 2010 को जिला मुख्यालय पर वार्ता करने को मजबूर हुए, जिसमें पूरा जिला प्रशासन, वनविभाग व एस.एस.बी ने संयुक्त रूप से संगठन के प्रतिनिधि मंडल से वार्ता कर लोगों पर लगाई गई रोक को समाप्त करना स्वीकार किया। यह बैठक पूरी तरह से लोगों के दबाव में हुई। अभी तक जो प्रशासन हमेशा वनविभाग के दबाव में रहता था, अब पूरी तरह से लोगों के दबाव में था।

ल्ेकिन जनवरी 2011 में फिर वनविभाग द्वारा रोक लगाई गई और इस बार थारू जनजाति की मूल स्वभाव से शान्त प्रवृति की महिलाओं ने लड़ाकू रुख अपनाते हुए सीधा संघर्ष करते हुए सामूहिक रूप से जंगल जाकर अपना अधिकार लिया।

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जनवरी 2012 में बनकटी रेंज के जंगल में जलौनी लकड़ी लेने गई महिलाओं पर दुधवा वार्डन ईश्वर दयाल व कोतवाल गौरीफंटा के नेतृत्व में पुलिस व वनविभाग ने हमला किया, स्थानीय सूडा गाॅव की एक महिला निबादा देवी माथे पर कोतवाल गौरीफंटा द्वारा रूल से किए गए वार के कारण बुरी तरह से घायल हुई। वार इतना तेज़ था कि कोतवाल का रूल टूट गया और माथा बहुत बुरी तरह से फट गया। महिलाएं फिर आन्दोलनरत हुई और वार्डन व कोतवाल पर एस.सी.एस.टी एक्ट के तहत मुकदमा कायम हुआ। वनविभाग द्वारा भी लोगों के खिलाफ लूट व जंगल काटने की धाराएं लगाकर सैकड़ों मुकदमे कायम किए गये।

जनवरी 2013 में पार्क प्रशासन व वन विभाग ने अपने मूल जनविरोधी चरित्र को ना छोड़ते हुए फिर से लोगों पर रोक लगानी शुरू की, लेकिन महिलाओं के नेतृत्व में यहां के थारू आदिवासियों ने संघर्ष का रास्ता अपनाया। इस बीच फरवरी 2013 में संगठन की मौजूदा राज्य सरकार से मुख्यमंत्री उ0प्र0 के निर्देश पर प्रदेश के वन मंत्री की अध्यक्षता में वार्ता हुई और इसका संचालन मुख्य सचिव मुख्यमंत्री द्वारा किया गया। जिसमें मुख्य सचिव सहित तमाम सम्बंधित विभागों के प्रमुख सचिव व राज्य स्तर के कई अधिकारी बैठे व संगठन की ओर से अग्रणी साथियों व विशेष रूप से प्रदेश के कई वनक्षेत्रों से समुदाय की महिला नेतृत्वकारी साथियों द्वारा अपने-अपने क्षेत्र की समस्याओं व वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन में आ रही दिक्कतों के बारे में बात की व लिखित रूप में भी दिया। राज्य सरकार ने इन सभी मुद्दों को गम्भीरता से लिया और कानून की क्रियान्वयन प्रक्रिया को तेज़ करने के लिए सहमति जताई। लगातार तेज़ होते ज़मीनी आंदोलन व इन सभी प्रक्रियाओं के असर में यहां  पुलिस व प्रशासन को फिर बीच में आना पड़ा, लेकिन इस बार पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी भी लोगों को जंगल से अपना अधिकार लेने से रोक नहीं पाए, जबकि वे पूरा-पूरा दिन जंगल में तैनात रहे। महिलाओं के तेवर और उनके तीव्र आंदोलन के आगे आखिरकार उनको झुकना पड़ा। 9 जून 2013 को उनकी पहल पर थारू आदिवासी म.म.कि. मंच के करीब 50 महिला-पुरूष प्रतिनिधियों व अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन के कार्यकर्ता के साथ, परियोजनाधिकारी, उपजिलाधिकारी पलिया व पुलिस क्षेत्राधिकारी पलिया ने बैठक की इस बैठक में वनविभाग की ओर से तीन डी.एफ.ओ और दुधवा वार्डन परियोजना अधिकारी के निमंत्रण पर आए, लेकिन बाहर से ही लोगों को बैठा और खुली बातचीत करता देखकर भाग गए।

बहरहाल इस बैठक में तय हुआ कि जल्द से जल्द वनाधिकार कानून के नियमावली संशोधन-2012 के तहत दिया गया तीसरा दावा जोकि वनसंसाधन के हक का दावा है उसे जल्द से जल्द भरकर उपखण्ड स्तरीय समिति में जमा करवाया जाए, जिससे सबसे पहले वनसंसाधन का अधिकार देने की प्रक्रिया को पूरा किया जा सके।

यहां लोगों में दावा भरने की प्रक्रिया लगातार तेज़ी पकड़ रही है। प्रशासन द्वारा भी अपने कर्मचारियों को भेजकर दावे भरवाए गए, लेकिन संगठन द्वारा भरवाए जा रहे दावे और उनके साथ लगाए जा रहे दस्तावेजो़ं से अधिकारी प्रभावित हैं और विभागीय कर्मचारियों द्वारा भरवाए गए दावे वापिस भी किए गए हैं कि अपने संगठन के माध्यम से भरो। संगठन द्वारा अपनी ओर से तैयार किए गए दस्तावेजों को भी मान्यता देते हुए समर्थन ज़ाहिर किया है। लेकिन वनविभाग अभी भी अपनी कूटनीतिक जनविरोधी चालों को चलने से बाज नहीं आ रहा है। मालूम हुआ है कि उन्होंने लोगों द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे सामुदायिक वनसंसाधनों के दावों पर यह लिख कर आपत्ति जताई है कि, दुधवा क्षेत्र के सभी थारू आदिवासी चूंकि आजीविका के लिए कृषि पर निर्भरशील समुदाय हैं, इसलिए ये वनाश्रित समुदाय नहीं हैं। इनका वनसंसाधनों पर कोई सामुदायिक अधिकार बनता ही नहीं है, इसलिए इनके दावे स्वीकार नहीं किए जाने चाहिएं। वनविभाग द्वारा दिया गया यह तर्क पूरी तरह से वनाधिकार कानून के मूल आधार के ही खिलाफ है, वनों में व वनों के आस-पास बसे वनाश्रित समुदायों की आजीविका हमेशा खेती और वनों दोनों पर ही आधारित होती है और कानून की प्रस्तावना में स्पष्ट किया गया है कि उनके अधिकारों को अभी तक अभिलिखत ना करके उनके साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है। ऐसे में वन विभाग द्वारा दिया गया ऐसा कोई भी तर्क वनाधिकार कानून के खिलाफ है और कानून का सीधा उलंघन है। संगठन ने तय किया है कि इस मुद्दे को ऊपर केन्द्र तक पहुंचाया जाएगा।

बहरहाल यहां दुधवाक्षेत्र के थारू आदिवासियों का समुदाय की महिलाओं की अगुआई में चल रहा यह आंदोलन आज तीसरे चरण में है, आज वे ना सिर्फ कानून के तहत मान्यता दिए गए वनसंसाधनों पर सामुदायिक अधिकारों की माॅग और अपना दावा कर रहे हैं, बल्कि वे सरकारी तौर पर इसे लागू ना करने की स्थिति में खुद आगे बढ़कर क्रियान्वित भी कर रहे हैं और कानून में दिए गए अधिकारों को संघर्ष के रास्ते से हासिल भी कर रहें हैं। अन्त में इस बात को फिर से दोहराना होगा कि ये बात स्पष्ट रूप से सामने आ रही है कि अब दुधवा क्षेत्र में वनविभाग और यहां के वनक्षेत्र में निहित स्वार्थों के तहत मुनाफा कमाने वाली ताकतों का वर्चस्व समाप्त होना और उनका जाना तय है। ऐसा स्पष्ट तौर पर दिखाई दे रहा है कि वो दिन अब दूर नहीं है, जब दुधवा नेशनल पार्क व टाईगर रिज़र्व जैसा संरक्षित क्षेत्र देश का पहला ऐसा राष्ट्रीय पार्क बनेगा जहां दुधवा के जंगल पर सामुदायिक स्वशासन स्थापित होगा जो कि वनाधिकार कानून की मूल मंशा के अनुसार यहां के वनाश्रित समुदायों द्वारा संरक्षित व सवंर्धित किया जाएगा। क्योंकि वन संसाधनों पर अधिकार के लिए किया गया यह सामूहिक दावा महज दावा ही नहीं है, इसमें वनों पर कायम वनविभाग व निहित स्वार्थों वाली विरोधी शक्तियों के हाथ से समुदायों के हाथ में वनस्वशासन के हस्तांतरण की बात निहित है। नेशनल पार्क के कोर जोन में बसे गाॅव सूरमा के नियमतिकरण की जीत से जो सफर शुरू हुआ है वो सामुदायिक स्वशासन की जीत को हासिल करने के लिए अपने कदमताल को लगातार तेज़ कर रहा है और जिसका मंजि़ल तक पहुंचना यहां की थारू जनजाति की महिलाएं पुरूषों के साथ मिलकर तय कर चुकी हैं।

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लाल सूरज अब उगेगा देश के हर गाँव  में

                     अब इकट्ठा हो चले हैं लोग मेरे गाँव  के-बल्ली सिंह चीमा 

रिपोर्ट – रजनीश

अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन

All India Union of Forest Working People

Vikalp Social Organization
11, Mangal Nagar,
Saharanpur – 247001
Uttar Pradesh
Ph : 91-9410471522
email: [email protected]

 

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