by- अल्लाम अशरफ़

कितना बड़ा सबक़ है दे रहा कोरोना,
आदमी को है ज़रूरी इंसानियत न खोना…

अदना से एक वायरस दिखलाया हक़ीक़त ज़मीनी,
इंसानी ज़िंदगी है या सरकारी खेल कोई घिनौना…

अफ़सर हो या हो नौकर, मज़दूर, पूँजीपति हो,
भूखे को मिले रोटी, थके को मिले बिछौना…

चाहे हो कोई मोमिन या भक्त हो हरी का,
देख भूखे बिलखते बच्चे बस आरहा है रोना…

छोड़ आए जिस गली को हम बेहतरी की ख़ातिर,
ये जाना आज हमने है क्या अपनों के बीच होना…

फटी एंड़ियाँ भी देखो देखो ये बहते आँसू,
ये ही हैं वो लोग जिनके हाथों ने उगला सोना…

ना जाने है क्या सनक जो लोग चल पड़े हैं,
आज़ाब बन गया ये रोज़गार खोना…

माँओं से दूर बच्चे किस हाल में फँसे हैं,
हमको फ़क़त पड़ी है हिंदू मुसलमान होना…

हिंदू जो हैं फँसे हैं मुसलमान छिप गये हैं,
नया फ़र्ज़ मीडिया का बन गया है ज़हर बोना…

लॉक्डाउन को सरकारें यूँ हर दिन बढ़ा रही हैं,
जैसे हो ग़ैरज़रूरी दवा और अस्पतालों का होना…

ना है दवाई हासिल ना टेस्टिंग ही मिल रही है,
है हुक्मरां के हुकुम से रौशन बालकनी का कोना…

सरकार की है साज़िश हो बटुए हमारे ख़ाली,
टैक्सेज़ के बाद बोलें पीएम केयर में फ़ंड दो ना…

आगे वो अमेरिका के अभी दुम हिला रहे हैं,
गुज़ारिशें है उनकी कुछ अस्लहे दे दो ना…

एक ताइवान देखो क्या गुल खिला रहा है,
सबको दिखा रहा है जम्हूरियत का आला नमूना…

अगला जो मौक़ा आए तो सोचना समझना,
मंदिर भी ढूँढना तुम, मज़हब पता लगाना,
एलाक़ा भी देख लेना और जात पूछ लेना,
जो हो रहा अभी वो हरगिज़ नहीं भुलाना,
रहबरों के वादे क्या क्या हैं लाए तुम तक,
कोई बेहतरी तुम्हारी या मज़हबी खिलोना…???

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