जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय

 

 

 

प्रदूषण एक देशव्यापी समस्या, राजनैतिक दल मतभेद छोड़ एक साथ काम करें, आपातकाल की स्थिति तक इंतज़ार ना करें

 

नवंबर 14, 2017, दिल्ली  : दीपावली के समय सर्वोच्च न्यायालय के दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के कारण पटाखों पर प्रतिबंध वाले आदेश पर देश भर में इसे धर्म से जोड़ते हुए बहुत बहस हुई । हिंदू संगठनों नेजोर शोर से अभियान चलाया की पटाखे चलाओ और खूब चलाओ । अफसोस है की हम प्रदूषण जैसी भयानक समस्या पर भी राजनीति करते हैं।  नतीजा हमारे सामने हैं ।  विभिन्न अदालतों के निर्णय कोप्रदूषण नियंत्रण के उपायों को एक तरफ करके हम जब पानी सर से ऊपर हो गया तब मूल समस्या के समाधान की ओर ना जाकर फिर से कुछ करने का दिखावा कर रहे हैं । ऐसा भी नहीं कि सरकारोंकी नियत साफ ना हो । किंतु केंद्र, दिल्ली व् पडोसी राज्यों की सरकारों में आपसी तालमेल ना होना व्दोषारोपण की राजनीति के कारण आज स्थिति इतनी खराब कर दी है कि दिल्ली के निवासियों के जीवनको दांव पर लगा दिया गया है ।

 

दिल्लीवासियों में भी खासकर गरीबों का जीवन, सड़क पर रहने वाले मजदूर, रिक्शा वाले, कूड़ा बीनने वाले ऐसे तमाम वर्गों के लोग जिनके पास एक बंद घर भी नहीं है, के जीवन को हमने दाव पर लगादिया है । प्रदूषण को रोकने के लिए कारो के लिए ऑड-ईवन जैसे उपायों की बात होती है जो कि ऊंट के मुंह में जीरे जैसी बात है। पिछले कुछ सालों से पड़ोसी राज्यों के किसानों पर पराली जलाने सेप्रदूषण फैलाने का इल्जाम लगाया जा रहा है किंतु पूसा संस्थान, पंतनगर या ऐसे अनेक कृषि विश्वविद्यालयों संस्थानों में कोई भी ऐसा अध्ययन शायद नहीं किया और यदि किया भी है तो वह सामने नहीं आपाया जो यह बताता की पराली को बिना जलाए कैसे उपयोग में लाया जाए । महंगी खेती, सस्ती कृषि उपज, पानी, खाद जैसी तमाम समस्याओं से जूझते किसानों पर अब मुकदमे लगाए जा रहे हैं । किसान क्या करे जब खेती में पशुओ की जरूरत ही ख़त्म होती जा रही है । कुल मिलाकर गरीबो और किसानो पर ही मार । उद्योग बंद किये जाते है तो भी गरीब मजदूरों पर ही असर आयगा ।

 

पराली तो बहुत समय से जलाई जाती है उसके भी अनेक कारण हैं खेत खाली करना है किंतु दिल्ली में जो तीव्र घनीभूत आबादी का रहना, उद्योगों का बढ़ना, तेजी से बढ़ता सड़क निर्माण कार्य व अनियंत्रितमकान आदि का निर्माण कार्य, सार्वजनिक वाहनों की कमी व् अनियंत्रित होती जा रही वाहनों की आबादी, वनभूमि व अन्य भूमि पर समुचित वृक्षारोपण का अभाव जैसे कारणों को क्यों नहीं देखा गया है?

 

अफसोस की बात है फिर भी सरकार जो नियम नीतियां बना रही है उससे गरीबों पर, गरीबों की जिंदगी पर कोई अच्छा प्रभाव नहीं पड़ने वाला । उनके जीवन रक्षण की कोई बात, कोई नीति नहीं । शायदइसलिए की नीति बनाने वाले उनकी समस्याओं तक पहुंच नहीं पाते, नतीजा होता है की प्रदूषण से बचाव की बात सिर्फ मध्यम और उच्च वर्ग तक सीमित मानी जा रही है ।

 

ध्यान देने को जरूरी है

  • ध्यान रहे की स्कूल बंद करने से सभी बच्चों का स्वस्थ्य संरक्षण नही होगा क्यूंकि बच्चों की एक बड़ी आबादी खुले में ही रहतीहै ।
  • कारो के लिए ऑड ईवन से प्रदुषण से ज़्यादा सडको को जाम से मुक्ति मिली । नुकसान भी हुए । भले ही हम उसकी उपयोगिता को नकार नहीं सकते किन्तु जरूरत एक बेहतर विकल्प की है ।
  • दिल्ली की आबादी का वह बड़ा हिस्सा जो बिना छत के रहता है या जिसकी छोटी सी छत के नीचे बड़े-बड़े परिवार रहते हैं उसको हर योजनामें सामने रखना होगा ।
  • प्रदूषित इकाइयों को बंद करना भी बेहतर विकल्प नहीं होगा क्योंकि उसका असर उसमें काम करने वाले मजदूरों और उनकी जीविका पर होगा । बल्कि बेहतर होगा कि इन इकाइयों पर तुरंत प्रदूषणनियंत्रण यंत्र आदि लगाए जाएं जिसकी कड़ी निगरानी होनी चाहिए ।
  • वास्तव में प्रदूषण बढ़ाना और जानबूझ कर बढ़ाना तो गैर इरादतन हत्या का जन्म होता है ।
  • हमें आज ही जलस्त्रोतों जलभंडारों जलप्रभावों को भी प्रदूषणमुक्त रखने का कड़ी योजना बनानी होगी हम धर्म के नाम पर मजहब के नाम पर किसी को भी इस बात की इजाजत नहीं दे सकते कीसदियों से जिन जलस्त्रोतों ने हमें जीवन दिया है उन्हें अब नष्ट कर दिया जाये ।
  • पानी के पुनः इस्तेमाल और संरक्षण के विकल्पों को इस्तेमाल करना चाहिए ।
  • सडको और अन्य तरह के निर्माण जैसे मेट्रो, फ़्लाइओवर, बड़े बड़े बिल्डिंग काम्प्लेक्स आदि के निर्माण के दौरान प्रदूषण रोकने के उपाय किए जाएँ, और ज़रूरत पड़ने पर कुछ समय के लिए काम रोके भी जाएँ ।

 

कुछ उपाय

  • पराली पर अध्यन की जरूरत, पराली के मुद्दे पर सरकार किसानो की मदद करे न की मुकद्दमे करे ।
  • जल संरक्षण के कारगर उपाय और पुराने जलाशयों का पुनर्निर्माण व पुनरुद्धार ।
  •  चौड़ी पत्ती के व् पपीता, आवला, निम्बू, बेल जैसे फलदार वृक्ष तथा तुलसी, एलोवेरा व अन्य स्वास्थ्यवर्धक प्रदूषण नियंत्रक पेड़ पौधों का लगाने जैसे उपाय हैं । जिन पर दिल्ली सरकार कोजनसंगठन ने २०१६ में विस्तृत योजना सहित पत्र भेजा है किंतु उस पर कोई कार्यवाही होती नजर नहीं आई ।
  • उद्योगों पर प्रदूषण नियंत्रण यंत्र के संदर्भ में युद्ध स्तर पर कड़ी व त्वरित कार्यवाही होनी चाहिए । कर्मचारियों व ऑफिसरो को इसके लिए ईनाम जैसे प्रोत्साहन देने चाहिए । जो ऑफिसर इसमेंदोषी पाए जाएं उन पर कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए उन पर जुर्माना लगना चाहिए ।

इस समस्या में हमें साथ खड़े होने की जरूरत है न कि इस को किसी भी तरह के राजनैतिक या धार्मिक चश्मे से देखने की आइए हम संकल्प करें कि प्रदूषण के खिलाफ गैर राजनीतिक गैर धार्मिकउन्मादी पहल करें ताकि हम दिल्ली को जो कि संसार के सबसे बड़े प्रजातंत्र की राजधानी है जीने योग्य बनाएं रहने योग्य बनाएं । आज ज़रूरत इस बात की भी है है की प्रदूषण की समस्या पूरे देश में बढ़ी है और लोगों के जीवन पर असर कर रही है इसलिए स्वच्छ हवा का अधिकार को संविधान के 21 धारा के मुताबिक़ मौलिक अधिकार का दर्जा देना चाहिए और Right to Clean Air Act, सरकार को तुरंत पारित करना चाहिए ।

 

मेधा पाटकर, नर्मदा बचाओ आन्दोलन व जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम); अरुणा रॉयनिखिल डे  शंकर सिंह, मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस), नेशनल कैम्पेन फॉर पीपल्सराइट टू इनफार्मेशन व एनएपीएम; प्रफुल्ला सामंतरा, लोक शक्ति अभियान व एनएपीएम (ओड़ीशा); डॉसुनीलम  आराधना भार्गव, किसान संघर्ष समिति व एनएपीएम (मध्य प्रदेश); पीचेन्निया, आंध्रप्रदेश व्यवसाय वृथिदारुला यूनियन (एपीवीवीयू), नेशनल सेंटर फॉर लेबर व एनएपीएम (आंध्र प्रदेश); रामकृष्णम राजू, यूनाइटेड फोरम फॉर आरटीआई व एनएपीएम (आंध्र प्रदेश); लिंगराज आज़ाद,समाजवादी जन परिषद, नियमगिरि सुरक्षा समिति, व एनएपीएम (ओड़ीशा); बिनायक सेन  कविता श्रीवास्तव, पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयुसीएल) व एनएपीएम; संदीप पाण्डेय, सोशलिस्टपार्टी व एनएपीएम (उत्तर प्रदेश); रिटायर्ड मेजर जनरल एसजीवोम्बत्केरे, एनएपीएम (कर्नाटक); गेब्रियल दिएत्रिच, पेन्न उरिमय इयक्कम, मदुरई व एनएपीएम (तमिलनाडु); गीथा रामकृष्णन, असंगठितक्षेत्र कामगार फेडरेशन, एनएपीएम (तमिलनाडु); अरुंधती धुरु  मनेश गुप्ता, एनएपीएम (उत्तर प्रदेश); ऋचा सिंह, संगतिन किसान मजदूर संगठन, एनएपीएम (उत्तर प्रदेश); विलायोदी वेणुगोपालप्रो.कुसुमम जोसफ, एनएपीएम (केरल); सुनीति एसआर., सुहास कोल्हेकर प्रसाद बागवे, एनएपीएम (महाराष्ट्र); सिस्टर सीलिया, डोमेस्टिक वर्कर्स यूनियन व एनएपीएम (कर्नाटक); आनंद मज्गओंकर कृष्णकांत, पर्यावरण सुरक्षा समिति व एनएपीएम (गुजरात); गौतम बंदोपाध्याय, एनएपीएम (छत्तीसगढ़); गुरुवंत सिंह, एनएपीएम, पंजाब; विमल भाई, माटू जनसंगठन, एनएपीएम (उत्तराखंड); जबर सिंह,एनएपीएम (उत्तराखंड); कामायनी स्वामी  आशीष रंजन, जन जागरण शक्ति संगठन व एनएपीएम (बिहार); महेंद्र यादव, कोसी नवनिर्माण मंच व एनएपीएम (बिहार); सिस्टर डोरोथी, एनएपीएम (बिहार);दयामनी बारला, आदिवासी मूलनिवासी अस्तित्व रक्षा समिति, बसंत हेतमसरिया, एनएपीएम (झारखंड); कैलाश मीना, एनएपीएम (राजस्थान); समर बागची  अमिताव मित्रा, एनएपीएम (पश्चिम बंगाल); अरुलडोस, एनएपीएम (तमिलनाडु); अंजलि भारद्वाज, नेशनल कैंपेन फॉर पीपल्स राइट टू इनफार्मेशन व एनएपीएम; कलादास डहरिया, रेला व एनएपीएम (छत्तीसगढ़);भूपेंद्र सिंह रावत, जन संघर्ष वाहिनी वएनएपीएम (दिल्ली); नान्हू प्रसाद, नेशनल साइकिलिस्ट यूनियन व एनएपीएम (दिल्ली); फैज़ल खान, खुदाई खिदमतगार व एनएपीएम (हरियाणा);मीरा संघमित्राएनएपीएम (तेलंगाना व आंध्र प्रदेश);  जेएस.वालिया, एनएपीएम (हरियाणा); राजेन्द्र रविमधुरेश कुमारअमित कुमारहिमशी सिंहउमा आकिब जावेद मजुमदार, एनएपीएम (दिल्ली); बिलाल खान, घर बचाओ घर बनाओ आन्दोलन वएनएपीएम, तारिनी मनचंदा, फ़िल्मकार, दिल्ली

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