Turn This Country Into Shaheen Bagh

NABINA DAS & RAJESH KUMAR |


 i want to write about shaheen bagh
but i’m not able to write about shaheen bagh
they say there’re thousands in shaheen bagh
burqas and bindis tell stories in shaheen bagh
but alas, i don’t live in shaheen bagh
thousands brave the cold in shaheen bagh
there’re songs flowing in shaheen bagh
the shamiana is lucky to be in shaheen bagh
it guards the women sleeping in shaheen bagh
dupattas become swords in shaheen bagh
hands clap and cheer in shaheen bagh
tea cups brew rebellion in shaheen bagh
the community kitchen serves freedom in shaheen bagh
flags and placards dot all of shaheen bagh
tasbih and slogans hold hands in shaheen bagh
fairies and djinns watch over shaheen bagh
narrating the magic tales of shaheen bagh
oh, it’s an alif laili shaheen bagh
where schehrezade wakes up in shaheen bagh
from breastfeeding infants sleeping in shaheen bagh
the toothless amma in nineties sing in shaheen bagh
their beauty lights up the streets of shaheen bagh
when rulers balk at the chants from shaheen bagh
daadis dare modi in shaheen bagh
the ‘aaeen (Constitution)’ shines in shaheen bagh
yes, azaadi lives in shaheen bagh
it wants a country of post offices in shaheen bagh
who are those that don’t know shaheen bagh?
only those murderers who rampaged shaheen bagh!
i’ve been dreaming each night of shaheen bagh
though I’ll barely know the sorrow of shaheen bagh
just because they hurt my friends in shaheen bagh
i want to be now called shaheen bagh
although I cannot write of shaheen bagh
i say, turn this country into shaheen bagh!

Nabina Das is a poet and writer based in Hyderabad. She has published three poetry collections and two books of fiction


बदल दो इस मुल्क को शाहीनबाग में (नबीना दास की कविता)

लिखना चाहती हूँ शाहीनबाग के बारे में,
मगर लिख नहीं पा रही मैं शाहीन बाग के बारे में,
कहते हैं हज़ारों लोग हैं शाहीनबाग में,
बुरक़े और बिंदियाँ कहती हैं कहानियाँ शाहीनबाग में,
लेकिन दुर्भाग्य की मैं नहीं रहती शाहीनबाग में,
हज़ारों लोग झेल रहे हैं ठंढ शाहीनबाग में,
बह रही है गीतों की बयार शाहीनबाग में,
कितना ख़ुशनसीब है वो शामियाना शाहीनबाग में,
जो कर रहा है औरतों की हिफ़ाज़त शाहीनबाग में,
दुपट्टा बना है तलवार शाहीनबाग में,
हाथ बजा रहे हैं तालियाँ, बढ़ा रहे हैं जोश, शाहीनबाग में,
चाय की प्यालियों में उबल रही है क्रांति, शाहीनबाग में,
लंगर परोस रहा है आज़ादी शाहीनबाग में,
हर तरफ़ हैं झंडे और तख़्तियाँ शाहीनबाग में,
जोड़कर हाथ में हाथ डटे हैं तसबीह और नारे शाहीनबाग में,
परियाँ और जिन्न दे रहे हैं पहरा, शाहीनबाग में,
कह रहे हैं जादुई कहानियाँ शाहीनबाग में,
वाह क्या अलिफलैला सा है मंज़र शाहीनबाग में,
दूध पीते बच्चे बनकर शहरजादे जग रहे हैं शाहीनबाग में,
नब्बे साल की पोपली बुढ़िया गा रही है तराने शाहीनबाग में
ख़ूबसूरती उनकी कर रही है गलियों को रोशन शाहीनबाग में,
हुक्मरान थर्रा जाते हैं जब उठते हैं नारे शाहीनबाग में,
दादियाँ मोदी को दे रही हैं चुनौतियां शाहीनबाग में,
चमक रहा है शान से संविधान शाहीनबाग में,
हाँ, आज़ादी है ज़िंदा शाहीनबाग में,
माँग रही है अवाम पोस्टऑफिसों का मुल्क शाहीनबाग में,
कौन हैं वो जो नहीं जानते शाहीनबाग को?
बस वो हत्यारे जिन्होंने रौंदा है शाहीनबाग को!
हर रात देखती हूँ सपने शाहीनबाग के,
जानती हूँ बहुत कम दर्द शाहीनबाग के,
पर जानती हूँ उन्होंने दिए हैं दर्द मेरे दोस्तों को शाहीनबाग में,
रख दो मेरा नाम शाहीनबाग, क्योंकि मैं भी हूँ शाहीनबाग, हाँ शाहीनबाग।
यूं तो लिख नहीं सकती नज्म शाहीनबाग की,
कहती हूँ मैं बदल दो इस मुल्क को शाहीनबाग में।

राजेश कुमार विश्व कविताओं के अनुवाद में रुचि रखते हैं। उनके अनुवाद हिंदी साहित्य की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं

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