Over 500 citizens of India have written an open letter to the Prime Minister registering their dissent against the government’s decision to permit and actively participate in the foundation stone laying ceremony for the Ram Temple in Ayodhya on August 5, and have made an appeal to immediately scrap this plan.

The letter mentions that “as rational and logical thinking Indians, we believe that the state should not be expending time and resources in religious practices especially at this time of a global health crisis,” and especially the Prime Minister as a representative of the Government of India should be resisting from spending time and resources in religious practices especially in this controversial issue which has got the Supreme Court’s intervention. They affirm that the Government must be following Article 51(A) which says to follow scientific temper and spirit of enquiry and believe that there is no extra scientist entity like God would save the country, rather government policies and focus on health would improve the lives of Indian citizens.

The letter appeals to the PM to invest in such government policies to ensure freedom from poverty, injustice, hunger, morbidity and mortality, superstition, violation of human rights, and take forward India on the real path of development which is sustainable and doesn’t harm the environment, as that is what can help the Indian citizens the most to counter the impact of the pandemic.

“We believe that programs to celebrate the laying of the foundation stone of the Ram Temple with the participation of the state, is in contravention of what the logical Indian stands for. A matter such as this is not only not a priority in the time of COVID-19, it will actively hamper efforts to contain the spread of the pandemic.” 

The signatories believe that permission for the event, in these times especially, and active participation of the state in religious matters at any time, defies all logic and constitutional principles and thus is far removed from what Indian citizens require. Religion and State should remain two different entities in the country and by converging the two we put forth a dangerous example for the future.

The letter also tries to put across to all political parties and their elected representatives, who in their political mandate or in their effort to walk the secular line have applauded the decision of conducting this program on August 5, that many Indians are not at all happy with such moves, and it is wrong to do this in our name. 

It may be noted that the Ministry of Home Affairs issued Unlock 3 Guidelines as recently as July 29th, which will  remain in force till 31st August. The guidelines in Section 1 (V) clearly specify that Large public gatherings continue to be prohibited. It further informs in section 7 that persons above 65 years of age are advised to stay at home through this lockdown 3 phase. In fact, Section 9 says State governments cannot dilute the provisions by MHA and section 10 puts penal action against anyone who violates the guidelines. So, will the PM and other minister attendees also face penal action for violating the guidelines? Further, Disaster Management Act is in place and section 5 of the Act suggests that optimum safety of people will be through avoiding the causes of hazard. Additionally, quarantine is expected to be maintained for a minimum period of 1 to 2 weeks when people cross state boundaries.

Amidst all these preventive steps which are expected to be taken by the common public, Chief Ministers of several states as well as Cabinet Ministers and the Prime Minister (a majority of whom are above the age of 65) have committed themselves to be on the list of people who will attend this program. We only need to go back a few months to understand how people of another religion were targeted for coming together in a religious congregation, held at a time when the COVID crisis had not even been acknowledged in the country, to understand what is today guiding our state. It is in this light that the letter calls upon the Prime Minister to scrap this plan immediately and prioritise the real needs of the people.

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अगस्त 3, 2020

प्रेस विज्ञप्ति 

राम से परहेज़ नहीं, लेकिन सरकार का ढकोसला नहीं स्वीकार 

प्रधान मंत्री को देश के आम नागरिकों का खुला पत्र 

भारत के 500 से ज़्यादा नागरिकों ने प्रधान मंत्री को एक खुले पत्र में सरकार के अयोध्या में 5 अगस्त को राम मंदिर के शिलान्यस के विख्यात आयोजन को इजाज़त देने और उसमें सक्रियता से शामिल होने के निर्णय पर अपना विरोध दर्ज़ किया है, और इस आयोजन को त्वरित खारिज करने की दरख्वास्त की है|  

भारत के तार्किक नागरिकों की ओर से, यह पत्र के हस्ताक्षर-कर्ताओं ने बात रखी है कि सरकार को वैश्विक स्वास्थ्य संकट के समय तथा किसी और समय से ज़्यादा, वर्तमान समय में देश के संसाधन और समय को धार्मिक अनुष्ठानों  में नहीं खपाना चाहिए|”  वे कहते हैं कि सरकार को संविधान के आर्टिकल 51(क) का पालन करना चाहिए जहाँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण ओर मानववाद की भावना विकसित करने की बात की गयी है, कि कोई भगवान देश को नहीं बचाएगा, वरन सरकार की उपयुक्त नीतियाँ ही लोगों के काम आ सकती हैं| पत्र में प्रधानमंत्री से निवेदन है कि ऐसी नीतियों में निवेश करें जिससे देश को गरीबी, भुखमरी, बीमारी, मृत्यु, अन्याय, अन्धविश्वास और मानव अधिकारों के हनन से आज़ादी मिलें और प्रकृति को बचाते हुए भारत को वास्तविक विकास के रास्ते पर ले जा सके जिससे इस महामारी के असर से सभी भारतीय नागरिक बच सकें|

“सरकार की सहभागिता के साथ राम मंदिर के भूमि पूजन जैसे समारोह को मनाना, किसी भी विवेकशाली, तार्किक भारतीय की समझ के विपरीत है। यह मसला न सिर्फ अभी की स्थिति में सरकार की प्राथमिकता से बाहर होना चाहिए, बल्कि ऐसा विशाल समारोह कोविड के फैलाव को रोकने के प्रयास को बाधित करेगा।”

पत्र में दस्तख़त करने वाले लोगों का मानना है कि ऐसे कार्यक्रम को अनुमति देना, खासकर इस दौर में, और  किसी भी दौर में सरकार का धार्मिक मामलों में सक्रिय भूमिका निभाना, तर्क और संवैधानिक मूल्यों के ख़िलाफ़ है और भारत के एक आम इंसान की वास्तविक ज़रूरतों से मीलों दूर है। धर्म और राज्य एक दूसरे के विरोधाभाषी है और इस आयोजन द्वारा इन दोनों का मिश्रण भविष्य के लिए एक बहुत खतरनाक उदाहरण नुमा प्रस्तुत किया जा रहा है|  

पत्र सभी राजनैतिक पार्टियों और उनके चुने हुए जन प्रतिनिधियों की तरफ है, जो अपने राजनीतिक जनादेश  के भीतर या धर्म निरपेक्षता की आड़ में 5 अगस्त के सम्मेलन के निर्णय को वाहवाही दे रहे हैं, उन सभी को हम यह याद दिलाते हैं कि बहुत से देशवासी आपके इन कदमों को अपने हित में नहीं मानते  हैं, और हमारे नाम पर यह हरकत करना गलत है । 

यह दर्ज़ किया जाये कि अनलॉक 3 के दिशानिर्देश गृह मंत्रालय द्वारा हाल में जुलाई 29 को ही पुनः निर्देशित किये गए हैं, और ये 31 अगस्त तक कायम हैं| इन दिशानिर्देशों की धारा 1 (5) में बहुत स्पष्ट लिखा है कि बड़े पब्लिक आयोजन प्रतिबंधित ही रहेंगे| यह दिशानिर्देश धारा 7 में आगे यह भी रेखांकित करता है कि अनलॉक 3 के दरमियान 65 वर्ष से ऊपर के लोगों को घर में ही रहने के लिए सलाह दी जाती है| इसके ऊपर, विपदा प्रबंधन अधिनियम अभी देश में लागू है और इस कानून की धारा 5 प्रस्ताव रखती है कि लोगों की सर्वोत्तम सुरक्षा बनाये रखने के लिए आपदा के खतरों से लोगों को बचाना होगा| इसके अतिरिक्त, यह भी ध्यान दें कि राज्य सीमाओं को पार करने के वक्त लोगों से १ से 2 हफ्ते के क्वोरिनटाइन रखने की अपेक्षा की जाती है| | 

कोविड के रोकथाम के लिए आम नागरिकों से अपेक्षित इस सब के बीच, देश के विभिन्न राज्यों के मुख्य मंत्री, कई केन्द्रीय मंत्री और प्रधान मंत्री (जिनमें से ज़्यादातर लोग 65 वर्ष से ऊपर के हैं) ने  इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए अपनी स्वीकृति दर्ज़ की है| आज हमारे राज्य को क्या ताकतें दिशा दे रही हैं,  यह हमे कुछ महीने पीछे जाने से ही समझ आता है कि जब  किस तरह किसी धर्मविशेष  के लोगों को निशाना बनाया गया था जबकि वे एक ऐसे समय धार्मिक सम्मेलन में शामिल होने आये थे, जब देश में कोविड का संकट पहचाना भी नहीं गया था| इस परिपेक्ष्य में यह पत्र हमारे प्रधान मंत्री से माँग करता है कि इस समारोह की योजना त्वरित ख़ारिज की जाए, और लोगों के असली मसलों को महत्त्व दिया जाये। 

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