पाश जितने पंजाबी के कवि हैं, उतने ही हिंदी के और इसके अधिक आंदोलन के कवि हैं


by- Piyush Raj

अवतार सिंह संधू उर्फ पाश वैसे तो पंजाबी के कवि हैं लेकिन हिंदी में उनकी लोकप्रियता कहीं से कम नहीं है. पाश की कविताओं के हिंदी अनुवाद को लोग किसी हिंदी कवि की तरह ही पढ़ते हैं. पाश का जन्म 9 सितंबर 1950 को पंजाब के जालंधर जिले के तलवंडी सलेम में हुआ था. पाश बहुत ही कम दिन जिंदा रहे और अपनी कविताओं की वजह से 23 मार्च 1988 को खालिस्तान समर्थकों द्वारा मार दिए गए.

दुनिया में ऐसे बहुत कम वाकये हैं जब किसी कवि को उसकी कविता की वजह से मार दिया गया हो. वैसे किसी की कवि की कविता की सफलता इसी में मानी जाती है जो आम लोगों में आकर्षित करे और किसी भी तरह के सत्ताधारी या उन्मादी के लिए खतरा बन जाए. नामवर सिंह पाश की तुलना इसी वजह से स्पेन के कवि लोर्का से करते हैं जिन्हें उनकी कविता की वजह से जनरल फ्रैंकों ने मरवा दिया था.

भगत सिंह और पाश

पाश सिर्फ 37 साल जिंदा रहे और संयोग से उनकी शहादत का दिन उनके आदर्श भगत सिंह की शहादत के दिन ही है. भगत सिंह के बारे में पाश लिखते हैं-

भगत सिंह ने पहली बार

पंजाब को

जंगलीपन, पहलवानी व जहालत से

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बुद्धि‍वाद की ओर मोड़ा था

जिस दिन फांसी दी गई

उसकी कोठरी में

लेनिन की किताब मिली

जिसका एक पन्‍ना मोड़ा गया था

पंजाब की जवानी को

उसके आखिरी दिन से

इस मुड़े पन्‍ने से बढ़ना है आगे

चलना है आगे.

पाश भगत सिंह के इस मुड़े पन्ने को खोलकर आगे बढ़ने वाले कवि और व्यक्ति थे. भगत सिंह की तरह उन्होंने भी फर्जी और खोखले धर्मवाद और राष्ट्रवाद का विरोध किया. भगत सिंह का कहना था कि उनके लिए आजादी का मतलब है कि मजदूर-किसानों का राज न कि गोरे साहबों की जगह भूरे साहबों का राज. इसी तरह पाश के लिए भी भारत का अर्थ था- किसानों का भारत. पाश लिखते हैं-

भारत के अर्थ

किसी दुष्यंत से संबंधित नहीं

वरन खेतों में दायर हैं

जहां अन्न उगता है

जहां सेंध लगती है…

इसी तरह पाश लिखते हैं-

हां, मैं भारत हूं चुभता हुआ उसकी आंखों में

अगर उसका अपना कोई खानदानी भारत है

तो मेरा नाम उससे खारिज कर दो

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दरअसल पाश किसी भी तरह के प्राचीन या आधुनिक राजपुत्र या खानदान से भारत के अस्तित्व को देखने के विरोधी थे. उनके भारत का मतलब था आम मेहनतकश लोगों का भारत और उनके सपने. पाश बेहतर भविष्य के सपने को जिंदा रखने के हिमायती थे इसलिए वे सपने के मर जाने को इस दुनिया के लिए सबसे खतरनाक मानते थे-

सबसे खतरनाक होता है

मुर्दा शांति से भर जाना

न होना तड़प का सब सहन कर जाना

घर से निकलना काम पर

और काम से लौटकर घर आना

सबसे खतरनाक होता है

हमारे सपनों का मर जाना

संघर्ष और जिजीविषा के कवि

पाश जिजीविषा के कवि हैं. संघर्ष उनके लिए महत्वपूर्ण है, चाहे इसके लिए कितनी ही कुर्बानी क्यों न देनी पड़े. पाश साफ-साफ शब्दों में इसकी दृढ़ता से घोषणा करते हैं-

हम लड़ेंगे जब तक

दुनिया में लड़ने की जरूरत बाकी है…

जब बंदूक न हुई, तब तलवार होगी

जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी

लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी

और हम लड़ेंगे साथी…

हम लड़ेंगे

कि लड़ने के बगैर कुछ भी नहीं मिलता

यही वजह है कि पाश को झूठ-मूठ का कुछ नहीं चाहिए-

हम झूठ-मूठ का कुछ भी नहीं चाहते

और हम सब कुछ सचमुच का देखना चाहते हैं-

जिंदगी, समाजवाद, या कुछ भी और…

पाश कविता में सीधे-सीधे चुनौती देते हैं. ऐसा नहीं है कि उन्हें सत्ता की ताकत का अंदाजा नहीं था लेकिन सत्ता की ताकत से अधिक पाश को जनता की जिजीविषा पर भरोसा है. वे जनता की तुलना घास से करते हैं. जिस तरह घास देखने में कमजोर भले ही लगती है पर उसके अस्तित्व को मिटा पाना असंभव है, उसी तरह जनता भले शोषित और गरीब दिखे लेकिन उसके भीतर किसी भी सत्ता की बुनियाद को हिला देने की क्षमता है. जनता की इसी क्षमता पर पाश

लिखते हैं-

मैं घास हूं

मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा

बम फेंक दो चाहे विश्वविद्यालय पर

बना दो होस्टल मलबे का ढेर

सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर

मुझे क्या करोगे?

मैं तो घास हूं, हर चीज ढक लूंगा

हर ढेर पर उग आऊंगा

पंजाब में जिस वक्त पाश लिख रहे थे उस वक्त खालिस्तान के नाम पर धार्मिक राष्ट्रवाद का जोर था. पाश ने इस धर्मांधता के नाम हिंसा की मुखालफत करते हुए कई कविताएं लिखीं जैसे- धर्म दीक्षा के लिए विनयपत्र, बेदखली के लिए विनयपत्र आदि. उस वक्त ऐसी कविताएं लिखना एक साहस का काम था और इसकी कीमत पाश को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी.

वामपंथ की गलत नीतियों का किया था विरोध

पाश घोषित रूप से मार्क्सवादी थे और नक्सलबाड़ी आंदोलन ने उन्हें काफी प्रभावित किया था. पाश के लिए मार्क्सवाद मुक्ति की विचारधारा थी और इस मुक्ति की विचारधारा से जुड़े लोगों में अगर उन्हें कोई कमी-कमजोरी नजर आई तो इसका भी उन्होंने विरोध किया. कामरेड से बातचीत पाश की एक लंबी कविता है. इस कविता में पाश ने खुलकर वामपंथ की कमियों पर लिखा है. पाश ने रूस के स्टालिन की नीतियों से विरोध जताते हुए लिखा है-

और शब्द ‘STATE’ में दोनों में से तुम्हें

कौन-सी ‘T’ पसंद है कामरेड?

अफलातून का गणराज्य

अरस्तू का राज्यधर्म

और ट्राट्स्की की खोपड़ी में धंसी कोमिनटर्न की कुल्हाड़ी

कामरेड, तुम्हें तीनों में कोई रिश्तेदारी लगती है?

आदमी का गर्म लहू ठंडे फर्श पर फैलना

और नस्ल में सुधार का बहाना

तुम्हें कैसा लगता है कामरेड?

पाश की एक और विशेषता है कि वो सर्वहारा की बात करते हुए निम्न मध्यमवर्ग को भूल नहीं जाते. वे निम्नमध्यमवर्ग को सत्ता का दलाल कहकर दुत्कारने की जगह मजदूर और किसानों के संघर्ष से जुड़ने को कहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि निम्न मध्यमवर्ग भी सर्वहारा से ही निकला है. इसलिए पाश शिक्षक और पुलिस के सिपाही से भी संवाद कायम करते हैं.

पाश एक ऐसे कवि थे जिनकी कथनी और करनी में फर्क नहीं था. यानी कविता और आंदोलन उनके लिए अलग-अलग नहीं था. यही वजह है कि पाश जितने पंजाबी के कवि हैं, उतने ही हिंदी के और इसके अधिक आंदोलन के कवि हैं. पाश को हम भगत सिंह के विचारों को कविता में ढालने वाला कवि भी कह सकते हैं.

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