भारत में एक अजीब रिवाज चल पड़ा है. वह यह कि दुनिया के विकसित देश जिस योजना और तकनीकी को खारिज कर देते हैं, हम लोगों के अदालत सहित सभी सरकारी संस्थान उसे सफलता की कुंजी समझ बैठते हैं.

Byडॉ. गोपाल कृष्ण Jan, 2022

वोटर आईडी कार्ड को आधार से लिंक करने वाला चुनाव कानून (संशोधन) विधेयक, 2021 विपक्ष के विरोध के बावजूद 21 दिसंबर को राज्य सभा से भी पास हो गया. ये विधेयक एक दिन पहले ही लोकसभा से पास हुआ था. विधेयक को स्थाई समिति के पास भेजने की मांग को ठुकरा दिया गया. चुनाव कानून (संशोधन) बिल, 2021 में वोटर आईडी कार्ड को आधार संख्या से लिंक किए जाने का प्रावधान है.

इस विधेयक में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन किए गए हैं. 1950 के कानून के अनुसार, कोई व्यक्ति निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के पास अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन कर सकता है.

इस कानून में संशोधन के बाद इस विधेयक के अनुसार, “निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी किसी व्यक्ति से उसकी पहचान साबित करने के लिए उसका आधार पेश करने के लिए कह सकता है. यदि उसका नाम पहले से ही वोटर लिस्ट में है, तो सूची में दर्ज एंट्री के प्रमाणीकरण के लिए आधार संख्या की आवश्यकता हो सकती है.”

इसमें कहा गया है, “किसी व्यक्ति द्वारा आधार न दे पाने की वजह से न तो वोटर लिस्ट में उसका नाम शामिल करने से वंचित किया जाएगा और न ही वोटर लिस्ट से उसका नाम हटाया जाएगा, बशर्ते इसके लिए (आधार न देने के लिए) उसके पास ‘पर्याप्त कारण’ हों. ‘पर्याप्त कारण’ को परिभाषित नहीं किया गया है वोटर आईडी कार्ड का “आधारीकरण” सरकारी हिंसा का हिस्सा है.

वोटर आईडी कार्ड को आधार से लिंक करने का प्रयास 2012-2015 में चुनाव आयोग ने अंधाधुंध भ्रामक प्रचार कर शुरू हुआ था. तत्कालीन गृह सचिव राज कुमार सिंह और मुख्य चुनाव आयुक्त शाहबुद्दीन याकूब कुरैशी के बीच के पत्राचार से इसका खुलासा होता है. मार्च 2015 से अगस्त 2015 तक राष्ट्रीय मतदाता सूची शुद्धिकरण कार्यक्रम (NERPAP) चलाया था. उस समय चुनाव आयोग ने 30 करोड़ से अधिक वोटर आईडी को आधार से लिंक कर लिया था. इस प्रक्रिया पर रोक सिटीजन्‍स फोरम फॉर सिविल लिबर्टीज और अन्य लोगों के प्रयास से लगी. बाद में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के वोटर डेटाबेस घोटाले का मामला सामने आया.

आधार कानून की तरह ही बिना चर्चा और बहस के इस विधेयक को पास करा लिया गया. कांग्रेस का विरोध आधा-अधूरा था. आधार से जुड़े मामले में कांग्रेस व अन्य दलों को विरोध करने के तरीके ब्रिटेन की कंजर्वेटिव पार्टी व लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी से सीखना चाहिए. लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स के अध्ययन के बाद ब्रिटेन के दोनों दलों के गठबंधन ने ब्रिटेन के आधार (नेशनल ID) को नष्ट कर दिया. गठबंधन ने अपने चुनाव अभियान में टोनी ब्लेयर सरकार के नेशनल आईडी का विरोध करते हुए ये वादा किया था कि उनके नेतृत्व वाली सरकार इसे रोक देगी. अपने वादे पर वे खरे उतरे. भारत के सियासी दलों के लिए ये एक सबक है. वादे और जुमलों में जमीं आसमां का फर्क होता है.

लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता निक कलेग ने ब्रिटेन के उपप्रधानमंत्री के तौर पर जो भाषण वहां की संसद में दिया वह भी आधार-वोटर आईडी के संदर्भ में समीचीन है.

सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने अपने सितंबर 2018 के निर्णय में विदेशी कंपनियों द्वारा इलेक्‍ट्रॉनिक-बायोमेट्रिक उपनिवेशवाद के बारे में अब तक जो उनकी समझ बनी है उसका परिचय दिया है. उन्होंने इस बात को नजरंदाज कर दिया कि ब्रिटेन के बायोमेट्रिक नेशनल आईडी का हवाला देकर ही विप्रो नामक कंपनी ने भारत सरकार के लिए यूआईडी आधार का शुरुआती पत्र तैयार किया था, लेकिन जब ब्रिटेन ने अपना बायोमेट्रिक नेशनल आईडी रोक दिया तो भारत में इसके पैरोकारों ने चीखती हुई चुप्पी ओढ़ ली.

बायोमेट्रिक यूआईडी/आधार संख्या और आधार कानून का भविष्य तय होना अभी बाकी है. न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में इन चार जजों को आइना दिखा दिया. बाद में नवम्बर 2019 में पांच जजों की पीठ ने भी इन चार जजों के निर्णय पर सवाल उठा कर मामले को सात जजों को सौप दिया है.

गौरतलब है कि इससे पहले वित्त कानून 2017 के जरिये आधार कानून में संशोधन करके वह कर दिया गया जो वित्त मंत्री रहते प्रणब मुखर्जी ने संसद में बायोमेट्रिक “ऑनलाइन डेटाबेस” अनूठा पहचान अंक (यूआईडी/आधार) परियोजना की घोषणा करते वक्त अपने 2009-10 बजट भाषण में नहीं किया था. अंततः भारत सरकार ने वित्त कानून 2017 में कंपनी कानून, 2013 और आधार कानून, 2016 का जिक्र साथ-साथ कर ही दिया था. इसके बाद वित्त कानून 2018 के द्वारा भी मौजूदा कानून में संशोधन करके विदशी कंपनियों को देशी कंपनी के रूप में परिभाषित कर दिया गया है. परिणामस्वरूप संविधान सम्मत कानून के राज की समाप्ति करके कंपनी राज की पुनः स्थपाना की विधिवत घोषणा कर दिया है. इसने देश के राजनीतिक भूगोल में को ही फिर से लिख डाला है जिसे शायद एक नयी आजादी के संग्राम से ही भविष्य में कभी सुधारा जा सकेगा. इसके कारण बायोमेट्रिक यूआईडी/आधार अनूठा पहचान परियोजना और कंपनियों के इरादे के बीच अब तक छुपे रिश्ते जगजाहिर हो गए है. मगर अदालतों, सियासी दलों और नागरिकों के लिए आधार कानून, 2016, वित्त कानून 2017 और वित्त कानून 2018 का अर्थ अभी ठीक से खुला ही नहीं है.

भारत में एक अजीब रिवाज चल पड़ा है. वह यह कि दुनिया के विकसित देश जिस योजना और तकनीकी को खारिज कर देते हैं, हम लोगों के अदालत सहित सभी सरकारी संस्थान उसे सफलता की कुंजी समझ बैठते हैं. अनूठा पहचान (यूआईडी)/आधार संख्या परियोजना और आधार कानून 2016 पर अदालत का फैसला इसकी ताजा मिसाल है. मोटे तौर पर ‘आधार’ तो बारह अंकों वाला एक अनूठा पहचान संख्या है, जिसके द्वारा देशवासियों के संवेदनशील आकड़ों को सूचीबद्ध किया जा रहा है. लेकिन यही पूरा सच नहीं है. असल में यह 16 अंकों वाला है मगर 4 अंक छुपे रहते हैं. इस परियोजना के कई रहस्य अभी भी उजागार नहीं हुए हैं. शायद इसीलिए सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के पांच जजों में से चार जज सरकार द्वारा गुमराह हो गए. सरकारी व कंपनियों के विचारकों के अनुसार भारत “मंदबुद्धि लोगों का देश” है. शायद इसीलिए वो मानते जानते है कि लोग बारीक बातों की नासमझी के कारण खामोश ही रहेंगे.

भारतवासियों को “मंदबुद्धि” का मानने वालों में भारतीय गृह मंत्रालय के तहत नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड (नैटग्रिड) विभाग के मुखिया रहे कैप्टन रघुरमन भी हैं. कैप्टन रघुरमन पहले महिंद्रा स्पेशल सर्विसेस ग्रुप के मुखिया थे और बॉम्बे चैम्बर्स ऑफ इंडस्ट्रीज एंड कॉमर्स की सेफ्टी एंड सिक्योरिटी कमेटी के चेयरमैन थे. इनकी मंशा का पता इनके द्वारा ही लिखित एक दस्तावेज से चलती है, जिसका शीर्षक “ए नेशन ऑफ नम्ब पीपल” अर्थात असंवेदनशील मंदबुद्धि लोगों का देश है. इसमें इन्होंने लिखा है कि भारत सरकार देश को आंतरिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं कर सकती. इसलिए कंपनियों को अपनी सुरक्षा के लिए निजी सेना का गठन करना चाहिए. इसके लिए जरूरी है कि ‘कॉर्पोरेटस’ सुरक्षा के क्षेत्र में कदम बढ़ाएं.

इनका निष्कर्ष यह है, “यदि वाणिज्य सम्राट अपने साम्राज्य को नहीं बचाते हैं तो उनके अधिपत्य पर आघात हो सकता है.” कैप्टन रघुरमन बाद में नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड के मुखिया बने. इस ग्रिड के बारे में तीन लाख कंपनियों की नुमाइंदगी करने वाली एसोसिएट चैम्बर्स एंड कॉमर्स (एसोचैम) और स्विस कंसलटेंसी के एक दस्तावेज में यह खुलासा हुआ है कि विशिष्ट पहचान/आधार संख्या इससे जुड़ा हुआ है. कुछ समय पहले तक ये सारे दस्तावेज सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध रहे है.

आजादी से पहले गठित अघोषित और अलोकतांत्रिक राजनीतिक पार्टी “फिक्की” (फेडरेशन ऑफ इंडियन कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) द्वारा 2009 में तैयार राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद पर टास्कफोर्स (कार्यबल) की 121 पृष्ठ कि रिपोर्ट में सभी जिला मुख्यालयों और पुलिस स्टेशनों को ई-नेटवर्क के माध्यम से नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड (नैटग्रिड) में जोड़ने की बात सामने आती है. यह रिपोर्ट कहती है कि जैसे ही भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) तैयार हो जाएगा, उसमें शामिल आंकड़ों को नेशनल ग्रिड का हिस्सा बनाया जा सकता है.

ऐसा पहली बार नहीं है कि नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड और यूआईडीएआई (आधार कार्यक्रम को लागू करने वाला प्राधिकरण) के रिश्तों पर बात की गई है. कंपनियों के हितों के लिए काम करने वाली संस्था व अघोषित और अलोकतांत्रिक राजनीतिक पार्टी “एसोचैम” और स्विस परामर्शदाता फर्म केपीएमजी की एक संयुक्त रिपोर्ट ‘होमलैंड सिक्योरिटी इन इंडिया 2010’ में भी यह बात सामने आई है.

इसके अलावा जून 2011 में एसोचैम और डेकन क्रॉनिकल समूह के प्रवर्तकों की पहल एवियोटेक की एक संयुक्त रिपोर्ट ‘होमलैंड सिक्योरिटी एसेसमेंट इन इंडिया: एक्सपैंशन एंड ग्रोथ’ में कहा गया है कि ‘राष्ट्रीय जनगणना के तहत आने वाले कार्यक्रमों के लिए बायोमेट्रिक्स की जरूरत अहम हो जाएगी.’ इस रिपोर्ट से पता चलता है कि यूआईडी/आधार से जुड़े राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर कार्यक्रम का लक्ष्य क्या है.

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गौरतलब है कि वर्तमान सरकार ने डॉ. मनमोहन सिंह के दामाद इंटेलिजेंस ब्यूरो में कार्यरत अशोक पटनायक को 13 जुलाई 2016 को नैटग्रिड का प्रमुख बना दिया. यह पद अप्रैल 2014 से खाली था क्योंकि कैप्टन रघु रमन के खिलाफ खुफिया रिपोर्ट के कारण उन्हे नया कांट्रैक्ट नहीं दिया गया था. मार्च 2017 में गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट से यह बात सामने आई कि नैटग्रिड में सूचना प्रौद्योगिकी के सक्षम उम्मीदवारों की कमी के कारण 35 पद खाली हैं.

यह मामला लोक सभा में भी उठा था. देशी तकनीकी और देशी सूचना और बायोमेट्रिक प्रोद्योगिकी में सक्षम लोगों को दरकिनार कर विदेशी तत्त्वों को ऐसे संवेदनशील मामलों में शामिल करना भी देशवासियों और देश की सुरक्षा को खतरे में डालता प्रतीत होता है. सुप्रीम कोर्ट के आधार और नैटग्रिड के रिश्तों को अभी तक नहीं रखा गया है. लोक सभा में इस संबंध में सवाल उठाया गया है.

वैसे तो अमेरिका में आधार जैसी बायोमेट्रिक यूआईडी के क्रियान्वयन की चर्चा 1995 में ही हो चुकी थी मगर हाल के समय में धरातल पर इसे अमेरिकी रक्षा विभाग में यूआईडी और रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (आरएफआईडी) की प्रक्रिया माइकल वीन के रहते उतारा गया. वीन 2003 से 2005 के बीच एक्विजिशन, टेक्नोलॉजी एंड लॉजिस्टिक्स (एटी ऐंड एल) में अंडर सेक्रेटरी डिफेंस हुआ करते थे. एटी ऐंड एल ने ही यूआईडी और आरएफआईडी कारोबार को जन्म दिया. अंतरराष्ट्रीय फौजी गठबंधन “नाटो” के भीतर दो ऐसे दस्तावेज हैं जो चीजों की पहचान से जुड़े हैं. पहला मानकीकरण संधि है जिसे 2010 में स्वीकार किया गया था.

दूसरा एक दिशा निर्देशिका है जो नाटो के सदस्यों के लिए है जो यूआईडी (आधार इसका ब्रांड नाम है) के कारोबार में प्रवेश करना चाहते हैं. ऐसा लगता है कि भारत का नाटो से कोई रिश्ता बन गया है. यहां हो रही घटनाएं इसी बात का आभास दे रही हैं. इसी के आलोक में देखें तो चुनाव आयोग और यूआईडीएआई द्वारा गृह मंत्रलय को भेजी गयी सिफारिश को मतदाता पहचान पत्र को यूआइडी के साथ मिला दिया जाय, चुनावी पर्यावरण को बदलने की एक कवायद है जो एक बार फिर इस बात को रेखांकित करती है कि बायोमेट्रिक प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का इस्तेमाल उतना निर्दोष और राजनीतिक रूप से तटस्थ चीज नहीं जैसा कि हमें दिखाया जाता है.

ध्यान देने वाली बात ये है कि चुनाव आयोग की वेबसाइट के मुताबिक हर ईवीएम में यूआईडी होता है. विपक्षी सियासी दलों ने ईवीएम के विरोध में तो देरी कर ही दी अब वे बायोमेट्रिक यूआईडी/आधार के विरोध में भी देरी कर रहे है. यही नहीं, राज्यों में जहां इन विरोधी दलों कि सरकार है वह वे अनूठा पहचान यूआईडी/आधार परियोजना का बड़ी तत्परता से लागू भी कर रहे हैं. वे इसके दूरगामी परिणाम से अनभिज्ञ हैं.

यह ऐसा ही है जैसे अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति जब पहली बार शपथ ले रहे थे तो उन्हें यह पता ही नहीं चला कि जिस कालीन पर खड़े थे वह उनके परम विरोधी पूंजीपति डेविड कोच की कम्पनी इन्विस्ता द्वारा बनायी गई थी. डेविड कोच ने ही अपने संगठनों के जरिये पहले उन्हें उनके कार्यकाल के दौरान गैर चुनावी शिकस्त दी और फिर बाद में चुनावी शिकस्त भी दी. भारत में भी विरोधी दल जिस बायोमेट्रिक यूआईडी/आधार और यूआइडी युक्त ईवीएम की कालीन पर खड़े हैं वह कभी भी उनके पैरों के नीचे से खींची जा सकती है. लोकतंत्र में विरोधी दल को अगर आधारहीन कर दिया जाता है तो इसका दुष्परिणाम जनता को भोगना पड़ता है क्योंकि ऐसी स्थिति में उनके लोकतान्त्रिक अधिकार छि‍न जाते हैं.

ईवीएम के अलावा जमीन के पट्टे संबंधी विधेयक में जमीन के पट्टों को अनूठा यूआइडी/आधार से जोड़ने की बात शामिल है. यह सब हमारे संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण होगा और प्रौद्योगिकी आधारित सत्ता प्रणाली की छाया लोकतंत्र के मायने ही बदल रहा है जहां प्रौद्योगिकी और प्रौद्योगिकी कंपनियां नियामक नियंत्रण से बाहर है क्योंकि वे सरकारों, विधायिकाओं और विरोधी दलों से हर मायने में कहीं ज्यादा विशाल और विराट हैं.

यूआइडी/आधार और नैटग्रिड एक ही सिक्के के अलग-अलग पहलू हैं. एक ही रस्सी के दो सिरे हैं. विशिष्ट पहचान/आधार संख्या सम्मिलित रूप से राजसत्ता और कंपनिया विभिन्न कारणों से नागरिकों पर नजर रखने का उपकरण है. यह परियोजना न तो अपनी संरचना में और न ही अमल में निर्दोष हैं. हैरत कि बात यह भी है कि एक तरफ गांधी जी के चंपारण सत्याग्रह के 100 साल होने पर सरकारी कार्यक्रम हो रहे हैं वही वे गांधी जी के द्वारा एशिया के लोगो का बायोमेट्रिक निशानदेही आधारित पंजीकरण के खिलाफ उनके पहले सत्याग्रह और आजादी के आन्दोलन के सबक को भूल गए.

उन्होंने उंगलियों के निशानदेही द्वारा पंजीकरण कानून को कला कानून कहा था और सबंधित दस्तावेज को सार्वजनिक तौर पर जला दिया था. चीनी निवासी भी उस विरोध में शामिल थे. ऐसा लगता है जैसे चीन को यह सियासी सबक याद रहा मगर भारत भूल गया. चीन ने बायोमेट्रिक निशानदेही आधारित पहचान अनूठा परियोजना को रद्द कर दिया है.

गौरतलब है कि कैदी पहचान कानून, 1920 के तहत किसी भी कैदी के उंगलियों के निशान को सिर्फ मजिस्‍ट्रेट की अनुमति से लिया जाता है और उनकी रिहाई पर उंगलियों के निशान के रिकॉर्ड को नष्ट करना होता है. कैदियों के ऊपर होने वाले जुल्म की अनदेखी की यह सजा की अब हर देशवासी को उंगलियों के निशान देने होंगे और कैदियों के मामले में तो उनके रिहाई के वक्त नष्ट करने का प्रावधान रहा है, देशवासियों के पूरे शारीरिक हस्ताक्षर को रिकॉर्ड में रखा जा रहा है. बावजूद इसके जानकारी के अभाव में देशवासियों की सरकार के प्रति आस्था धार्मिक आस्था से भी ज्यादा गहरी प्रतीत होती है. सरकार जो कि जनता की नौकर है अपारदर्शी और जनता को अपारदर्शी बना रही है.

(लेखक 2010 से आधार संख्या-NPR-वोटर ID परियोजना व गुमनाम चंदा विषय पर शोध कर रहे हैं. इस संबंध में संसदीय समिति के समक्ष भी पेश हुए.)

courtesy Newslaundry